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"लावारिश लाश"

Posted On: 10 Jun, 2012 में

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मन धडकनों के नगाड़े बजा रहा था , जाने डाक्टर साहब ब्लड टेस्ट की क्या रिपोर्ट बताएं ? खैर सांसों पर लगाम लगाये जैसे ही मैंने पूछना चाहा, उससे पहले ही डाक्टर साहब ने बोला भरी जवानी में ये रोग तो संभव नहीं ! ये सुनते ही सारे आंसू इकदम तैनात हो गए बलिदान देने को ,

फिर भी मैंने दिल पर पहाड़ रख पूछ लिया तो डाक्टर साहब बोले :,”भाई तुमे किसी व्यंग के कीड़े ने काट लिया और ये लाइलाज बिमारी है ,और बड़े भारी मन से मै रास्ते की ऊँगली पकड़  अपने घर को चल दिया !

तभी रास्ते मे पड़ने वाली झुग्गिओं के नेहरुओं की गोल गोल भीड़ देखी, तो मन ने ख्यालो के लड्डू फोड़ खाने शुरू कर दिए , मन हजारी हो गया ,

इक मन कहता भाई जरुर जमूरे-चूरघुश्डू का जादुई खेल होगा, दूजा मन बोला,”नहीं यार रामप्यारी  बंदरिया को मनाने मदारी आया होगा  रामप्यारे बन्दर को लेकर ! तीजा मन बोला : नहीं मित्र लग गई तुम्हारी चांदी ,साँप-केंचुली के मुफ्त दर्शन ! मुफ्त केंचुली रखो किताब मे और ज्ञान बढाओं!

तभी दिमाग ने अडंगी लगाते हुए बोला अबे ओ !  शेखचिल्ली ,मुल्ला नसीरुद्दीन, गोनू  झा पहले जाकर देख तो ले !,अब इतना जलील होने के बाद तो भइया , आत्मा पानी-पानी हो जाए ! तो मेरी क्या औकात ?

तो जैसे ही हमने नहर की परिक्रमा की तो, नजारा कुछ और निकला , नहर में इक लावारिश लाश, बड़े ही ऐशो आराम से परनाले की  गलीज  पर बिस्तर लगाये आराम फरमा रही थी !

अपने  जीवनकाल में जो कुछ विशिष्ट उपलब्धियां मैंने हासिल की है जैसे बालिग़ होने पर ही लौहपथगामिनी में प्रथम प्रवेश, यौवन में ब्रह्मचर्य का रसपान  इत्यादि ,उनमे ये लावारिश लाश के दर्शन सबसे ऊपर रेंकिंग पे जा विराजमान हो गया !

तभी कानाफुसिओं ने मेरे कान पर धावा बोल दिया, जितने मुंह, उतनी बाते !

इक मुँह  : भाई ये लाश तो बड़ी मोटी ताजा है, किसी रईसजादे की लगती है !

दूसरा मुँह  :( अपनी अक्लियत का परिचय देते हुए ) अरे नहीं ये तो ! इसके कुम्भकर्णीये नींद और आलस का नतीजा है,

तीसरा मुँह  : पर इसे क्या जरुरत पड़ी थी, हमारे घर के पास आकर डेरा ज़माने की ?

चौथा मुँह  : (सज्जन जान पड़ता था) अरे मित्र जब ये हमारे आँगन आ गया तो क्यूँ न ! इसका सुन्दर स्वागत किया जाए !

और लल्लू को कलुआ ढोलक वाले को बुलावा लाने  भेज दिया !

पांचवा मुँह : (लाश के पास जाते हुए ) अरे देखो , इसके हाथ पे गुदा है “कविराय फरीदाबादी “!

तभी छठा मुँह बोला  ( जो खुद भी इक कवि था ) : (जिसे कभी अपने हुनर दिखाने को मौका नहीं मिला था) अरे ये तो कोई विद्वान कवि मालुम पड़ते है , क्यूँ न यंही इक कवि सम्मलेन आयोजित किया जाए ,और वँही मौके की नजाकत

देखते हुए अवसरवादी रूप ले लिया ,और अपनी कविता का पाठ करने लगा :


दस्तूरे जिन्दगी भी खूब है ,

मौत से मुहब्बत है भी, और नहीं भी !

तमाम उम्र गुजार दी मैंने उसकी दीद को,

उसको मुझसे वास्ता है भी और नहीं भी !

आज तो जैसे उन महानुभाव कवि की निकल पड़ी, तालिओ के गडगडाहट गूंज गई , माहोल शायराना हो गया , सब अँधेरे लगे,उजाले बनने !

ये देख सांतवा मुँह : ( जो समाजसेवी होने का दंभ भरता था और राजनेता बनने को प्रयासरत था) देखीय ये क़ानूनी मामला है ,हमे इसे इसके घर रिश्तेदारों के पास भेजना होगा और लगा  अपनी राजनेतिक  नीव तलाशने  !

और अपना विलायती फोन निकाल, लगे दरोगा जी सितम सिंह को मिलाने , पर उनके फोन में बैठी रूपमती बोली,”डान को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है” !  उनकी तो जैसे गुगली हो गई !

और फिर कुछ सोचकर बोले : कुछ मित्र मेरे साथ चलिए दरोगा जी को बुला  लाते है ! उनके पास लम्बी सी गाडी थी,सायद इसलिए ,अपने-अपने सपने पूरा करने के मकसद से पूरी की पूरी जनता टूट पड़ी उनकी गाडी की तरफ !

पर ये देख उस राजनेतिक मुँह ने पैदल मार्च का फरमान सूना दिया और हम पैदल नहर मार्च करते पहुंचे  दरोगा जी के पास , जो उस समय जलेबियों पर जुल्म ढा रहे थे !दरोगा जी : क्या बात है ! इतनी भीड़ किसलिए ?

सांतवा मुँह : ( हाथ जोड़े नेता वाले मुद्रा में )  जनाब हमारे यंहा इक लावारिश लाश अपना पता भटक गई है ,कृपा उसका मार्गदर्शन करें !

ये सुन दरोगा जी का गुलाबी बदन इकदम पीला पड़ गया !

तभी मेरे दिल के अन्दर का  कोतुहल बोला भाई पूछ ले ,: आप तो रंग बदलने वाले मालुम पड़ते हैं , पर उनके “सेवामुनि बांसबाबा” की चढ़ी त्योरिओं को  देख साहस न जुटा पाया !

दरोगा जी ज्ञान मुद्रा में ही बोले : देखिये हम आप की कोई मदद नहीं कर सकते, क्यूंकि लाश ने जिस जगह डेरा बसाया है वो हमारे कर्मक्षेत्र से इक बित्ता ( बिलांत ) बाहर है ,या तो आप लाश को कहिये की वो उठकर हमारे क्षेत्र में आ जाए ,हम उसकी सेवा में तैयार हैं !

तभी आठवाँ मुँह : (  राजनेतिक मुँह को बगल में ले जाते हुए ) , आप व्यर्थ मे इन सरकारी अफसरों के चक्कर मे पड़ रहे हैं ,मै चैनी चोचले तांत्रिक को जानता हूँ , जो अपनी तंत्रशक्ति से मुर्दों  मे भी जान फुकने का माद्दा रखता है , और उसकी पेशगी भी चार आना है ,

और ज्ञानी अंदाज मे बोला,” हींग लगे ना फिटकरी, रंग भी चोखा होए”!

तभी नवा मुँह बोला : ( जो सायद किसी धार्मिक गुरु का भक्त था ) लगे हाथ ! मेरे गुरु श्री चमचम लालगुलाटी महाराज का समागम भी करवा दीजियेगा ,बड़ा पुण्य मिलेगा!

और सब के सब चल दिए वापिस उसी  “लावारिश लाश” नहर के पास ,कोई ढोल -ताशे, गाजे-बाजे लिए खड़ा था , तो कोई कविता पाठ कर रहा था , कोई लगा था अपने सगे-सम्बन्धी  को बुलाने ,आज जैसे बच्चों को छुट्टी का नया बहाना मिल गया था ,सब व्यापारी,दुकानदार, अपने अपने काम धंधे को ताला मार तमाशा देखने उसी और आ रहे थे ,  बाबाओं और तांत्रिकों की भीड़ भी  उसी और बढ़ आ रही थी !

पर ये क्या ! वो “लावारिश लाश” वंहा से गायब थी !

सायद इस अवसरवादी समाज और कामचोर तंत्र की बेरुखी देख नहर ने उसे दुसरे नए किनारे की और बढ़ा दिया था ,सायद उस  नहर और “लावारिश लाश” ने आज फिर इस भ्रष्टतंत्र से कोई नाजायज उम्मीद का पाप कर लिया था !


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51 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
June 19, 2012

प्रिय चन्दन जी ..बड़ी ही चिंता का विषय है …कई बार ऐसे ही हमने भीड़ देखी शहरों में अन्दर तक घुसा …देखा केवल भीड़ ही भीड़ और बातें… किस पर… विषय कौन… क्या ,,,वह गायब …जो होना चाहिए वह होता नहीं …जितने मुंह उतनी बातें … किया ही क्या जाए ..जो तडपता रहता है दुर्घटना में वहां से सब भाग जाते हैं या अस्पताल ले जाने की जगह तमाशा …. सार्थक और अच्छी शैली में लेख … भ्रमर ५

    चन्दन राय के द्वारा
    June 19, 2012

    भ्रमर साहब , आप ने इस अव्यवस्था को बहुत नजदीक से देखा है , इसलिय आप व्यंग के मूल अर्थ और उद्देश्य से परिचित हो गए , आपके उदार वचनों और बहुमूल्य समय के लिए आपका आभार

yamunapathak के द्वारा
June 18, 2012

एकदम निराला अंदाज़ hai इस blog kaa.और आपकी नयी रचना भी पढी बहुत सारी यादें judee हैं आपकी बच्चे ही पिटा को इस प्यार की अनुभूति कराते हैं अतः उन्हें भी सलाम.

    चन्दन राय के द्वारा
    June 18, 2012

    यमुना जी , आपके उदार शब्दों और स्नेह के लिए आपका आभारी हूँ !

Rajesh के द्वारा
June 17, 2012

चन्दन जी , बेहतरीन व्यंग

    चन्दन राय के द्वारा
    June 17, 2012

    राजेश साहब , आपके सुन्दर शब्दों के लिए धन्यवाद

nitaa के द्वारा
June 17, 2012

चन्दन जी, बहुत ही करारा व्यंग्य जो आज की मौकापरस्ती पर सटीक बैठता है … बहुत ही बढ़िया … बधाइयाँ ही बधाइयाँ !!सादर!

    चन्दन राय के द्वारा
    June 17, 2012

    नीता जी , आपके स्नेह के लिए कुछ भी कह पाना असंभव होगा धन्यवाद

sandeep के द्वारा
June 17, 2012

मेरे गुरु श्री चमचम लालगुलाटी महाराज का समागम भी करवा दीजियेगा ,बड़ा पुण्य मिलेगा! और सब के सब चल दिए वापिस उसी “लावारिश लाश” नहर के पास ,कोई ढोल -ताशे, गाजे-बाजे लिए खड़ा था , तो कोई कविता पाठ कर रहा था , कोई लगा था अपने सगे-सम्बन्धी को बुलाने ,आज जैसे बच्चों को छुट्टी का नया बहाना मिल गया था ,सब व्यापारी,दुकानदार, अपने अपने काम धंधे को ताला मार तमाशा देखने उसी और आ रहे थे , बाबाओं और तांत्रिकों की भीड़ भी उसी और बढ़ आ रही थी ! पर ये क्या ! वो “लावारिश लाश” वंहा से गायब थी ! क्या लिखते हो मित्र !

    चन्दन राय के द्वारा
    June 17, 2012

    संदीप जी , आपके मन को भाया , आपका शुक्रिया

pardeep के द्वारा
June 17, 2012

चन्दन जी, सायद इस अवसरवादी समाज और कामचोर तंत्र की बेरुखी देख नहर ने उसे दुसरे नए किनारे की और बढ़ा दिया था ,सायद उस नहर और “लावारिश लाश” ने आज फिर इस भ्रष्टतंत्र से कोई नाजायज उम्मीद का पाप कर लिया था ! बहुत धारदार व्यंग !

    चन्दन राय के द्वारा
    June 17, 2012

    परदीप जी आपके सुन्दर शब्दों के लिए धन्यवाद

Santosh Kumar के द्वारा
June 16, 2012

चन्दन जी ,.सादर नमस्कार बहुत करारा धारदार व्यंग्य ,.व्यंग्य के कीड़े का काटना बहुत अच्छा और सुखद लगा.. उस नहर और “लावारिश लाश” ने आज फिर इस भ्रष्टतंत्र से कोई नाजायज उम्मीद का पाप कर लिया था !…बहुत बहुत बधाई

    चन्दन राय के द्वारा
    June 17, 2012

    संतोष जी , आपके मन को भाया , आपका शुक्रिया

pritish1 के द्वारा
June 15, 2012

नमस्ते…..चन्दन जी……….पुन: आपके लेखन से प्रभावित हूँ अपने लेखन मैं विलम्ब के लिए क्षमा चाहूँगा मैंने अपनी रचना ऐसी ये कैसी तमन्ना है…..का दूसरा भाग प्रकाशित किया है आप कहानी के पहले भाग से परिचित हैं………..मेरी कहानी पढें और अपने विचारों से मुझे अवगत करायें…….आशा करता हूँ आपको अच्छा लगेगा……. धन्यवाद..!

    चन्दन राय के द्वारा
    June 15, 2012

    प्रीतिश जी , आपके शब्दों और समय के लिए आपका धन्यवाद , में आपके लेख तक जरुर पहुचुन्गा

yogi sarswat के द्वारा
June 13, 2012

सायद इस अवसरवादी समाज और कामचोर तंत्र की बेरुखी देख नहर ने उसे दुसरे नए किनारे की और बढ़ा दिया था ,सायद उस नहर और “लावारिश लाश” ने आज फिर इस भ्रष्टतंत्र से कोई नाजायज उम्मीद का पाप कर लिया था ! मित्रवर चन्दन राय जी , व्यवस्था पर बड़ा चुटीला व्यंग्य कसा है !

    चन्दन राय के द्वारा
    June 14, 2012

    योगी मित्र , आपको चुटीला लगा , आपका धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
June 13, 2012

बड़ी लाइलाज बीमारी है यह…. यह संक्रामक न हो … यही खतरा है …. “लावारिश लाश” ने आज फिर इस भ्रष्टतंत्र से कोई नाजायज उम्मीद का पाप कर लिया था ! रोचक rachna !

    चन्दन राय के द्वारा
    June 14, 2012

    जवाहर साहब , आप जैसे विद्वान को पसंद आया आपके स्नेह के लिए कुछ भी कह पाना असंभव होगा धन्यवाद

chaatak के द्वारा
June 12, 2012

स्नेही चन्दन जी, जीवन के हर क्षेत्र में फ़ैल रहे अवसरवाद पर इस व्यंग को पढ़ कर काफी अच्छा लगा| अच्छे लेखन पर हार्दिक बधाई!

    चन्दन राय के द्वारा
    June 14, 2012

    चातक मित्र , आपके ह्रदय को पसंद आया , आपका तहे दिल से शुक्रिया

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 12, 2012

अवसरवादियों पर करारा प्रहार करता चुभता और चुभोता धारदार व्यंग्य के लिए हार्दिक बधाई (बदले स्वरुप में ) चन्दन जी !! पुनश्च !

    चन्दन राय के द्वारा
    June 14, 2012

    गुंजन साहब , सवरूप बदला है , पर मन तो वही है श्रीमान < आपके सुन्दर शब्दों के लिए धन्यवाद

roshni के द्वारा
June 12, 2012

चन्दन जी , एक व्यंगकार ही है जो गंभीर बातों को भी कितने हलके फुल्के तरीके से कह डालता है और सीधा दिलो दिमाग पे असर करता है …बहुत सटीक अच्छा व्यंग आभार

    चन्दन राय के द्वारा
    June 14, 2012

    रौशनी जी , आप लोग ही प्रमाणित करते है ,आप कहे तो काम के ,नहीं तो नाकारा आपका धन्यवाद

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 12, 2012

यह हकीकत है. मैं स्वयं जिन्दा ही सीमा विवाद में कष्ट भोग चूका हूँ. प्रवाहमय लेख कोई २ पाट नहीं. सीमा विवाद नहीं. बधाई

    चन्दन राय के द्वारा
    June 14, 2012

    कुशवाहा जी , आपके स्नेह के लिए कुछ भी कह पाना असंभव होगा धन्यवाद

Rajkamal Sharma के द्वारा
June 11, 2012

प्रिय खुशबूदार चन्दन जी ….. सप्रेम नमस्कारम ! पता नहीं किस मरदूद ने उस मुर्दे को कैडबरी की चाकलेट खिला दी जो वोह वहां से “एक बिलांत” खिसक कर नदी की धारा में फिर से मिलते हुए दूर कहीं आगे बह गया …. वैसे तो अम्मा कहती है की कुछ मीठा खा लेने / खिलाने से हमेशा ही कुछ शुभ ही होता है , लेकिन यहाँ पर कुछ अनुमान नहीं लगा पा रहा हूँ की उस नासपीटी लाश को किसी अहमक ने किस खुशी में चाकलेट खिला दिया ?….. और चाकलेट को खा लेने के बाद उस मुई लाश को कौन सी खुशी नसीब हुई होगी ?….. अगर पता चल जाए तो जरूर बतलाईयेगा :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P जय श्री कृष्ण जी

    चन्दन राय के द्वारा
    June 14, 2012

    राजकमल जी , आप अग्रज अनुभवी सज्जन व्यक्ति को रचना का रूप पसंद आया , आपका धन्यवाद !

dineshaastik के द्वारा
June 11, 2012

चंदन जी नमस्कार, अवसरवाद पर बहुत ही सटीक  व्यंग…….. आपके व्यंग  बहुत  प्रभावित  करते हैं……

    चन्दन राय के द्वारा
    June 11, 2012

    दिनेश जी , आप जैसे विद्वान को पसंद आया आपके स्नेह के लिए कुछ भी कह पाना असंभव होगा धन्यवाद

akraktale के द्वारा
June 10, 2012

चन्दन जी सादर नमस्कार, अच्छा व्यंग है.दरोगा जी जब ज़िंदा कि रिपोर्ट नहीं लिखते तो मुर्दा की क्या लिखेंगे. लाश ने तो दरोगा का नाम आते ही वहां से सटकने का प्लान बना लिया होगा. बधाई.

    चन्दन राय के द्वारा
    June 11, 2012

    अशोक साहब , बिलकुल सही कहा आपने महोदय , दरोगा जी तो लगे थे जलेबिआं तोड़ने ! आप जैसे विद्वान को पसंद आया धन्यवाद

jyotsnasingh के द्वारा
June 10, 2012

प्रिय चन्दन जी, आपको व्यंग के कीड़े ने काट कर बहुत ही अच्छा किया ,वर्ना हम अपनी कार गुजारियों पर कैसे हँसते.हमलोग सभी तो मौका परस्त हैं,बिचारी लाश क्या बोलती सब अपने अपने कयास लगते हैं,और अपनी दुगति और न देख पाने की दशा में किसी और किनारे जा लगती है पर समाज को तो आईना दिखा ही दिया.

    चन्दन राय के द्वारा
    June 10, 2012

    ज्योत्सना जी , आप लोगो का विश्वाश मुझे में और नई रचनात्मक् शक्ति भारती है , अब कीड़े तो बहुत से काट लिए , और अब बिमारी भी लाइलाज है तो सोचा क्यूँ ना लगे हाथ ये जनम सवार ले , और आपका स्नेह बस उम्र बढ़ा रहा है

vikramjitsingh के द्वारा
June 10, 2012

चन्दन जी….नमस्कार….. आज तो बदले-बदले हुए……सरकार नज़र आते हैं……. जोरदार और करारे व्यंग की बधाई लें जनाब…….

    चन्दन राय के द्वारा
    June 10, 2012

    विक्रम साहब , क्या करे वक्त के साथ हालात बदल जाते है , हालात के साथ जज्बात बदल जाते है आपकी सराहना के लिए धन्यवाद !

June 10, 2012

अवसरवाद पर बहुत ही सुन्दर व्यंग्य ………………………..! एक उम्मीद…..इस विषय पर लिखा जाना चाहिए था और आज आपके द्वारा लिखा भी गया था. परन्तु आप लिखेंगे यह उम्मीद नहीं थी क्योंकि यदि इसी मंच की बात किया जाय तो यहाँ कुछ भी होने पर सबसे पहिले आप ही पहुंचते हैं…………………..वैसे बहुत अच्छा लिखा है आपने हार्दिक आभार!

    चन्दन राय के द्वारा
    June 10, 2012

    अनिल जी , ये मारा ! ये लगा आपका तडका ! तो आपकी खाशियत झट से गिरफ्तार करते है आप , में इतना ही कह पाऊंगा की मत मुझे इतना इंसान- इंसान बनाईये की में इंसान से हैवान हो जाऊं ! आपको अच्छा लगा , चलो अपनी तो निकल पड़ी !

    June 11, 2012

    किस गलत फहमी में हैं जनाब……………………….आप इतना कुछ ऊपर लिख चुके ……………………फिर आप को लगत है कि आप और हम इंसान है………………………किसी को भी बनाया और बिगाड़ा नहीं जा सकता…….जो जैसा है वह वैसा ही हैं…मेरे नज़र में न कोई अच्छा है और ना बुरा……………..हाँ यदि बुराई है तो उसका सामने लाना ही होगा ……..मुझको ना ही अनिल से मतलब है और ना ही चन्दन से ………………..पर बीच-बीच में यदि शारीर पर फोड़ा हो जाये तो उसका ऑपेरशन तो करना ही पड़ेगा…………….

    चन्दन राय के द्वारा
    June 12, 2012

    अनिल जी , आपसे सहमत , मुझे भी भेड़ चाल में चलना पसंद नहीं , रटा रटाया बोलने की आदत नहीं , बिलकुल यही होना चाहिय , चाहे वो कोई भी हो , चाहे कितना कडवा ही क्यूँ न लगे , पर हाँ मर्यादा में रहकर , आपके विचारों से पूर्णत सहमत

    June 16, 2012

    मर्यादा……………इसकी सीमा अलग-अलग व्यक्तियों के लिए अलग-अलग होती है……….अतः यह स्थायी है ही नहीं और न ही समांनातर …………….तो फिर इससे जकड़ना क्या?……. तो क्यों न हम इससे हटकर कुछ और बात करें…….बात हमारी और आपकी………क्यों न आप आप रहें और मैं मैं रहूँ………….कुछ और बनने की जरुरत क्या………..?

    चन्दन राय के द्वारा
    June 16, 2012

    अनिल जी , मार्यादा लक्षमण रेखा है आचरण का पर इससे में और तुम को पार होना होगा , ताकि हम रूप हो जाए जो जरुरी है आपसी सद्भाव ,प्रेम के लिए , किसी ने खूब कहा है हम हमी है तो क्या हम है तुम तुम्ही हो तो क्या तुम हो ,

    June 19, 2012

    बात तो आप सोलह आना सच कह रहे हैं……………..

satish3840 के द्वारा
June 10, 2012

चन्दन जी बहुत खूब / सायद इस अवसरवादी समाज और कामचोर तंत्र की बेरुखी देख नहर ने उसे दुसरे नए किनारे की और बढ़ा दिया था ,सायद उस नहर और “लावारिश लाश” ने आज फिर इस भ्रष्टतंत्र से कोई नाजायज उम्मीद का पाप कर लिया था ! सोचने को विवश कर दिया

    चन्दन राय के द्वारा
    June 10, 2012

    सतीश साहब , आप अग्रज अनुभवी सज्जन व्यक्ति को रचना का रूप पसंद आया , आपका धन्यवाद !

मनु (tosi) के द्वारा
June 10, 2012

आदरणीय चन्दन जी ! कमाल पर कमाल , बहुत ही करारा व्यंग्य जो आज की मौकापरस्ती पर सटीक बैठता है … बहुत ही बढ़िया … बधाइयाँ ही बधाइयाँ !!सादर!

    nishamittal के द्वारा
    June 10, 2012

    मनु जी से सह,मत हूँ आपने पैनी धार से वार किया है

    चन्दन राय के द्वारा
    June 10, 2012

    मनु जी , कुछ लोगो की सज्जनता के लिए कुछ भी कह पाना मुश्किल होता है , आपके इस सद्भाव और प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया शब्द छोटा है

    चन्दन राय के द्वारा
    June 10, 2012

    निशा जी , कुछ लोगो की सज्जनता के लिए कुछ भी कह पाना मुश्किल होता है , आपके इस सद्भाव,स्नेह और प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया शब्द छोटा है


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