कलम...

{ "हम विलुप्त हो चुकी "आदमी" नाम की प्रजातियाँ हैं" / "हम कहाँ मुर्दा हुए हमें पता नहीं".....!!! }

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"सिरफिरे गड्ढे"

Posted On: 1 Jun, 2012 में

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बूढ़े हो चले शहर को जैसे जवान होने का गंदा शौक हो चला था , चिलचिलाती धुप जैसे उसके साहस के  गिरेबान को पकड़ कर धोबी पछाड़ देने की भरसक कोशिश कर रही थी , पर सच है जब दिमाग पर कोई जुनूनी फितूर चढ़ता है ना तो कुछ नहीं समझ आता , न ही कोई उसे रोक सकता , ठीक ऐसा ही साहित्यिक जूनून, मुझे कब बदल गया पता ही नहीं चला ,

अब तो सोते-जागते आठो पहर विचारो के कीड़े दिमाग की बाती जलाये रखते है , कुलबुलाते रहते है और मुझे भी उबाले रखते है , खैर गाडी में बैठा में सोने की भरसक कोशिश कर रहा था और गाडी उड़नपरी की तरह 80 किलोमीटर /घंटा  के पंख लगाए उडी जा रही थी ,

अचानक ड्राइवर बाबु ने गाडी की नकेल कसी तो कनखी भरी आँखों से अनमने मन से जब मैंने  सामने देखा तो बदन के पिंजरे में कैद तोते तपाक से उड़ गय,होश ने धडकनों के टॉप गीअर को दबा दिया ,

सामने इक बड़े से बैनर पर लिखा था “गरीब गड्ढों का धरना प्रदर्शन”, और बैनर जैसे नए कपडे पहने बच्चे की तरह इठला इठला कर मुझे ही मुंह चिढ़ा रहा था, खुन्नस तो आई पर गुस्से को ठन्डे बसते में ये सोचकर रख दिया की भैया नेता लोगो को मामला होगा, क्यूँ पचड़े में पड़ना,

ख़ैर गाडी से उतर 11 नंबर की बस पर सवार मैं धरना प्रदर्शनकारियों को देखने की उत्सुकता में उस तरफ बढ़ा, भीड़ के बादल इस कदर फैले थे की “धरना प्रदर्शनकारियों ” देखना मुश्किल हो रहा था,

ख़ैर जैसे-तैसे धक्कम-मुक्की, रेलम-पेल कर मंच के समीप पहुंचा तो यकीन मानिय शरीर में काटो तो पानी नहीं, गला सुख गया ,

सामने मंच पर गड्ढे ही गड्ढे थे , जीवित गड्ढे , 6×6  के गड्ढे, छोटे गड्ढे , मोटे गड्ढे, बूढ़े गड्ढे , पतले गड्ढे और हाथ में झंडा  लिए थे, जिस पर लिखा था  “नेता जी, हमे बचाओ” ! साथ ही  जोर-जोर से  नारे लगा रहे थे , “हमे बेइमान नेता चाहिय, सडकों पर गड्ढों का आरक्षण चाहिय”

वँही  बिन बुलाये मेहमान की तरह हर जगह पहुचने वाली  ‘नारद’ सरीखी  मीडिया भी अपने अवसर की तलाश में थी ,

और  “धरना प्रदर्शनकारियों ” की संख्या कम देख रिपोर्टर बाबू लगे अवसर का भूजा भूजने ,

रिपोर्टर बाबू : माफ़ कीजिय पर यह आपका व्यक्तिगत मामला लगता है , शायद इस लिय आप जैसे और गड्ढा समुदाय यंहा नहीं पहुंचा !

बुजुर्ग गड्ढा (नेता)  : ये हमारे इमानदार हो रहे नेताओं का प्रकोप और गुंडागर्दी  है, जो उन्होंने सड़क के हाथों हमारी बस्तियां उजड्वा दी ! हमारी शादियाँ बंद करवा दी, और शादी-शुदा गड्ढों की नसबंदी तक करा दी ! अब हम बचे-खुचे गड्ढे ही बचे हैं, इसलिए हमारी संख्या कम है

रिपोर्टर बाबू को जैसे की सबको पता है  नीचा दिखने की खुजली होती है , इसलिय  उसने तत्काल ही —– — -

रिपोर्टर बाबू : पर माफ़ कीजिय आप लोग तो खानदानी अनपढ़ है , फिर आपने ये बेनर कैसे तयार किये , और यदि बाहर से छपवाया तो आपके पास इतना पैसा आया कँहा से !

बुजुर्ग गड्ढा (नेता) :( कुछ सकपकाते हुए) आप ने ठीक कहा ,ये बैनर हमने श्रीमान सज्जन पत्थर पेंटर से बनवाये हैं , हमने जो महान भ्रष्ट, हत्यारे, कमीने  नेताओं की सेवायें की ,उससे जो इनाम मिला ,आज उन्ही को अपनी बात मनवाने के लिए खर्च किया और कुछ नहीं !

रिपोर्टर बाबू : कैसी सेवा ?

तभी नेता जी का अपने चमचो के साथ आगमन — – - – - -

ये देख गड्ढे और जोर जोर से नारे लगाने लगे – - – -”हमे बेइमान नेता चाहिय, सडकों पर गड्ढों का आरक्षण चाहिय”

नेता जी अपने वफादार गड्ढों को इस तरह विद्रोह करते देख सन्न-सुन्न पड़ गए थे !

तभी बुजुर्ग गड्ढा (नेता) : नेता जी हमने आपके लिए क्या क्या नहीं किया ,आपने हमारे कंधो पर बैठ कितने ही वोट कमाए है ,आपके कितने ही पाप हमने अपने गड्ढो में दबाये हैं , कितने ही दुश्मन आपके इन गड्ढों में टपकाए हैं

नेता जी झट से आव देखा न ताव गड्ढों को झूठी दिलासा देते हुए , शीघ्र ही इक कमेटी आपके लिए गठित की जायगी!

बुजुर्ग गड्ढा (नेता) : हमे आपका भरोसा नहीं आपकी जुबान चाहिय ,

अब नेता जी जुबान कँहा से देते, जुबान तो वो  कई टुकड़े कर शहर में बाँट आये थे!

नेता जी अंटी में से हरी पत्तियाँ निकाल चुपके से बुजुर्ग गड्ढा (नेता) की तरफ धीरे से बढाते हुए—-

पर बुजुर्ग गड्ढा (नेता) : बाबु जी जब रहेंगे ही नहीं तो क्या करेंगे इसका, अचार डालेंगे ?

अब तो नेता जी धरम संकट में फस गए, आखिर जिसके नाम पर किस्मत चमकाई, वाही आज गले की हड्डी बन गया था !और किस मुंह से गड्ढे को सड़क पर रहने देने की घोषणा करते !

फिर जाने क्या मन्त्र धीरे से बुजुर्ग गड्ढा (नेता) के कान में पढ़ा की सारे गड्ढे मंच से उठे और चल दिए नेता जी की ऊँगली पकड़ ,

और नेता जी ने फिर जनता का  ये कह उल्लू काट दिया की मेरे शब्दों के जादू ने इन मासूम गड्ढों का ह्रदय परिवर्तन कर दिया है ,

मै सोचने लगा की ये मासूम गड्ढे कंही बाल्मीकि , कालिदास की तरह कोई महाग्रंथ ना लिख दे !

पर मेरे दिमाग का कीड़ा मुझे कहने लगा पता करो ऐसा क्या कह दिया नेता जी , जो सारे के सारे गड्ढे साधू हो गए !

खैर तभी मुझे अपने घर के समीप वाला गुस्सेल गड्ढा दिखाई दिया ,मै उसको चिढाने वाले अंदाज में बोला : बड़े आये थे धरना देने, अनशन करने ?

गुस्सेल गड्ढा : हूं~ हूं~ हूं~ ! तुम्हे क्या पता नेता जी ने हमे कहा की जब तक कंही भी सड़क नई नवेली दुल्हन की तरह सज संवर रही हो , अपना घर सजा रही हो , कंही भी कुछ समय जाकर घूम आना , और जैसे ही बारिश हफ्तावसूली को धमके , तुम भी आकर इनके आँगन में अपना घर बना लेना ,बाकी में संभाल लूंगा ,

और कुछ चिढाने के से अंदाज में गुस्सेल गड्ढा आगे बढ़ गया !

और मै सोचता रहा – - – - – - – - – - -


“वाह रे ! अनशन ,धरना के फैशन का दौर,

सब है क्रांतिकारी साधू , डाकू,लुटेरा ,चोर ” !

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758 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santosh Kumar के द्वारा
June 9, 2012

वाह चन्दन जी !…शानदार व्यंग्य ,.अद्भुत कल्पना !,…बहुत बहुत बधाई …देर से पढ़ने के लिए क्षमा चाहता हूँ

    चन्दन राय के द्वारा
    June 10, 2012

    संतोष जी मित्रवर , अरे आप इतना कीमती समय देके मेरी रचना को अपने अमूल्य शब्द देते है , ये क्या कम है मेरे लिए ,मे जानता हूँ व्यस्त समय के बिच कई बार बड़ा मुश्किल हो जाता है , अपनी तक भी पहुचना

seemakanwal के द्वारा
June 9, 2012

चन्दन जी सादर नमस्कार .गज़ब की कल्पना है .

    चन्दन राय के द्वारा
    June 10, 2012

    सीमा जी , आप जैसे अग्रजो के बड़प्पन है जो आपको रचना पसंद आई

yogi sarswat के द्वारा
June 6, 2012

वाह मित्रवर चन्दन राय जी ! नमस्कार ! बहुत खूब व्यंग लेख आपका

    चन्दन राय के द्वारा
    June 6, 2012

    योगी मित्रवर , आपका प्रेम है तो मित्र ,जो आपको खूब लगा

    Kairii के द्वारा
    July 11, 2016

    I’d verunte that this article has saved me more time than any other.

Prabhat के द्वारा
June 4, 2012

बहुत खूब व्यंग लेख आपका “सिरफिरे गड्ढे”

    चन्दन राय के द्वारा
    June 4, 2012

    आपके सुन्दर शब्दों के लिए आपका शुक्रिया

Rupesh के द्वारा
June 4, 2012

चन्दन तुम तो इंजीनीयर से लेखक हो गए हो , “सिरफिरे गड्ढे” ये भी खूब रही

    चन्दन राय के द्वारा
    June 4, 2012

    रुपेश दोस्त , आपकी दोस्ती का असर है यार , आपका आभार

rahul के द्वारा
June 4, 2012

चन्दन मित्र , कमाल का लिखते हो भाई , “सिरफिरे गड्ढे” जबरदस्त व्यंग

    चन्दन राय के द्वारा
    June 4, 2012

    राहुल मित्र , ये तो आपका प्यार है आपका आभार

kanahiyaa jha के द्वारा
June 4, 2012

वाह चन्दन जी बहुत खूब व्यंग लेख आपका

    चन्दन राय के द्वारा
    June 4, 2012

    झा साहब , सुन्दर विचारो के लिए आपका आभार

Punita Jain के द्वारा
June 3, 2012

आदरणीय चन्दन जी , आप एक अच्छे कवि के साथ साथ एक अच्छे व्यंगकार भी है |सडको पर पड़े गडढों और उसके कारणों पर सुन्दर व्यंग्य है आपका यह लेख

    चन्दन राय के द्वारा
    June 4, 2012

    पुनीता जी , कुछ नया करने की इच्छा हमेशा रहती है ,हालाकि अभी सर्वप्रथम में कवि रूप सफल हो जाना चाहता हूँ , मेरा मूल लक्ष्य इक सम्माननीय साहित्यकार होना है , जो हर विधा पे लिखता हो , आप खुद इतना अच्छा लिखती है , आपका कहा तो और मूल्यवान हो गया

    Becky के द्वारा
    July 11, 2016

    Fell out of bed feeling down. This has bretghined my day!

Rajkamal Sharma के द्वारा
June 3, 2012

आपके ब्लॉग पर अजब गजब हमने यह  नजारा देखा गड्डो को चलते फिरते +नपुंसक और कुंवारा देखा बेहतरीन व्यंग्य पर मुबारकबाद

    चन्दन राय के द्वारा
    June 3, 2012

    राजकमल जी , आप जैसे व्यंकार ने प्रमाणित कर दिया , जीवन सफल हो गया जी , आप लोग ही तो हमारी जरुरत ,प्राण हैं

akraktale के द्वारा
June 3, 2012

चन्दन जी सादर,”गुस्सेल गड्ढा : हूं~ हूं~ हूं~ ! तुम्हे क्या पता नेता जी ने हमे कहा की जब तक कंही भी सड़क नई नवेली दुल्हन की तरह सज संवर रही हो , अपना घर सजा रही हो , कंही भी कुछ समय जाकर घूम आना , और जैसे ही बारिश हफ्तावसूली को धमके , तुम भी आकर इनके आँगन में अपना घर बना लेना ,बाकी में संभाल लूंगा ,” बहुत ही सुन्दर व्यंग, लगातार आगे पढने की उत्सुकता बरकरार रही. बधाई.

    चन्दन राय के द्वारा
    June 3, 2012

    अशोक साहब , आपने बड़ी ही बारीक खुबसूरत बात कह रचना का मन खुश का दिया , आपके मन को छु पाया , दिल खुश हो गया ,आप उन लोगो में से है जिन्होंने शुरू से मेरा सहयोग किया ,जिसका उपकार में चुका नहीं सकता

raja के द्वारा
June 3, 2012

चन्दन भाई , आप इक बेहतरीन रचनाकार है

    चन्दन राय के द्वारा
    June 3, 2012

    रजा भाई , ये तो आपका प्यार है आपका आभार

sandeep के द्वारा
June 3, 2012

चन्दन जी मित्र क्या व्यंग्य हैं कमाल ,,,,,,, लिखा आपने

    चन्दन राय के द्वारा
    June 3, 2012

    संदीप भाई , आपके सुन्दर शब्दों के लिए आपका शुक्रिया

मनु (tosi) के द्वारा
June 3, 2012

बहुत बढ़िया क्या व्यंग्य हैं कमाल ,,,,,,, चन्दन जी आप तो जल्दी ही छा जाने वाले हो … बधाई

    चन्दन राय के द्वारा
    June 3, 2012

    मनु जी , आप कमाल है , और आप के कमाल से हम कमाल ! बस इतना ही कहूंगा

nishamittal के द्वारा
June 3, 2012

चन्दन जी,पता नहीं कैसे आपका ये महत्वपूर्ण आलेख मैं देख नहीं सकी .बहुत अच्छा आलेख +व्यंग्य.इसी विषय पर एक आलेख सड़कों में गड्ढे या गड्ढों में सड़कें लिखा था समय मिले तो उसको भी पढ़ें.

    चन्दन राय के द्वारा
    June 3, 2012

    निशा जी , आपकी सराहना के लिए धन्यवाद , पर अब में इन गड्ढों से उबर चूका हूँ , इसलिए आपके आलेख तक नहीं पहुच पाउँगा ! और समय की भी बेहद तंगी है ,अपने जीने के लिए ही वक़्त नहीं है अभी तो ?

jyotsnasingh के द्वारा
June 2, 2012

प्रिय चन्दन जी,केदिन बाद जागरण पर आयी सबसे पहले आपका ही लेख पढ़ा,ये गढ़हे मरे पता नहींक्यों बिना ढके और बिना भरे रखे जाते हैं ,शायद इसलिए की लोग इन में गिर जाएँ और मिलने वाले मुआवज़े में से हिस्सा मिले या फिर जब बच्चे गिर जाए तो उन्हें निकालने की कवायद में नेता और अफसर अपनी छवि चमका सकें और मीडिया को भी मसाला मिलता रहे.वैसे गड्ढे भर भी जाएँ तो पहली ही बरसात में फिर उभर आते हैं फिर से ठेका छोड़ने के लिए.

    चन्दन राय के द्वारा
    June 3, 2012

    ज्योत्सना जी , आप कृपा मंच से दुरी ना बनाये , आप बेहतरीन लिखती है , लिखीय किसी की परवाह ना करते हुए , लिखिए उनके लिए जो आपको पढना चाहते हैं कृपा अपनी रचना के साथ मंच पर लौट आये आपके आने से अपनापन सा महशुश होता है, क्यूंकि कुछ लोगो की छवि इतनी अनुपम होती है

anoop pandey के द्वारा
June 2, 2012

मित्र चन्दन जी बधाई……….अब गड्ढे और नेताओ का साथ पुराना है………..अगर गड्ढे नहीं होंगे तो मुद्दा का होगा और बाद में टेंडर किस बात के बनेगे? और पैसा कैसे बनाया जायेगा? अच्छा व्यंग है.

    चन्दन राय के द्वारा
    June 3, 2012

    अनूप मित्र , आपकी बात शत प्रतिशत उपयुक्त है , आपके शब्द और उपस्थिति दोनों उत्साहजनक है

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 2, 2012

तगड़ा और करारा व्यंग्य , चन्दन जी …….आप का कहना ही क्या है ? बधाई ! पुनश्च !

    चन्दन राय के द्वारा
    June 2, 2012

    आचार्य साहब , आप जैसे ग्यानी अग्रज हम जैसे गौण को सम्मान देते है , तो मन खुशिओं से गुलजार हो जाता है आपका तहे दिल से आभार

alkargupta1 के द्वारा
June 2, 2012

ये गड्ढा और नेता ……क्या खूब लिखा है चन्दन जी नेताओं की राजनीति पर तीक्ष्ण प्रहार किया है……..

    चन्दन राय के द्वारा
    June 2, 2012

    अलका जी, कुछ लोग है इस मंच पर जिनके आने का इन्तजार मेरी रचना जी जान से करती है , आपके आने से ही वो संतुष्टि होती है

allrounder के द्वारा
June 2, 2012

नमस्कार भाई चन्दन जी, गड्ढों मैं कूद और सबको उसमे डुबोकर कर अच्छा प्रहार किया आपने राजनीतज्ञों पर :) हार्दिक बधाई इसके लिए आपको !

    चन्दन राय के द्वारा
    June 2, 2012

    मित्रवर , अरे श्रीमान प्रहार का दुस्साहस में मुर्ख कैसे कर सकता हूँ , मैंने तो उनकी अनुकम्पा का वर्णन किया है

vikramjitsingh के द्वारा
June 2, 2012

प्रिय चन्दन भाई….कैसे हो…… आते जाते खूबसूरत आवारा सड़कों पे…… कभी कभी इतेफाक से…. कितने हसीं गड्ढे पड़ जाते हैं……. और मौका मिल जाता है….चन्दन भाई को…..अपनी भड़ास निकालने का… बहुत तीखा व्यंग किया है……गड्ढे रुपी नेताओं पर…..

    चन्दन राय के द्वारा
    June 2, 2012

    विक्रम जी बड़े भैया , कान्हा है मालिक , आपकी कलम के दर्शन किये हुए सदियों सा वक्त गुजर गया , और दिल में भी आपके बिना सुखा पड़ा है , तो गुरुदेव इक किराए का टंकर ला बरसा दो

MAHIMA SHREE के द्वारा
June 2, 2012

“वाह रे ! अनशन ,धरना के फैशन का दौर, सब है क्रांतिकारी साधू , डाकू,लुटेरा ,चोर ” ! क्या बात है चन्दन जी .. आपने तो बिलकुल चोंका दिया .. नए तेवर . नया फोटो … सब बढ़िया … बधाई हो … क्या व्यंग किया है … बहुत खूब

    चन्दन राय के द्वारा
    June 2, 2012

    महिमा जी , आपको बताऊँ इस नाचीज को कोई रास्ता ही नहीं दे रहा , किस्मत भी मुझसे कुश्ती लड़ रही पर हां दिल में ऐसे चोंके ओर छोंके बहुत है , पर आप जैसे हितेषी सम्मान दे ज़िंदा रखे है आपका शुक्रिया

Rajesh Dubey के द्वारा
June 2, 2012

भारतीय राजनीती में गड्ढों की एक अहम् भूमिका है. ये गड्ढे सरकारे बनाती और बिगाडती हैं.

    चन्दन राय के द्वारा
    June 2, 2012

    दुबे साहब , बड़े काम के गड्ढे , साथ दे तो नेता राजनेता नहीं तो नल्ले !

jlsingh के द्वारा
June 2, 2012

प्रिय चन्दन जी, सादर अभिवादन ! आपने तो गड्ढों को जो सुन्दरता प्रदान की है ….. वे भी क्या याद करेंगे किस excavater या catterpiller से पाला पर गया! बहुत ही सुन्दर! इस बार कविता से हटकर अच्छे व्यंग्य बाण चलाये हैं!… आपकी फोटो भी नयी हो गयी है, गर्मी के लिए टोपी लगा रखी शायद … बड़ी गर्मी है न?

    चन्दन राय के द्वारा
    June 2, 2012

    जवाहर साहब , अब गड्ढे महाराज का इतना उपकार जो है हम पे , इनके रिश्तेदार ने तो हमारे कूड़ा करगत ,मल जाने क्या अत्याचार बड़ी सज्जनता से बिना उफ़ किये सहे हैं , तो इनको कुछ ओ सम्मान देना बनता था न बॉस , अब सोचा था जनता जनार्दन पाक गयी हो गी कविता से , ऊपर से ये गर्मी , तो सोचा नया आलेख , नई तस्वीर , नया रंगमंच बढ़िया है हो जाएगा , अब गर्मी तो पड़ रही , जेठ की दुपहरी में पाँव जले , बदन जले है

dineshaastik के द्वारा
June 2, 2012

भाई चंदन जी भ्रष्टाचार पर बहुत ही सुन्दर व्यंग। हकीकत को बयां करता  आलेख….बधाई….

    चन्दन राय के द्वारा
    June 2, 2012

    दिनेश जी , आप जैसे अनुभवी और ग्यानी सज्जन अग्रजों को पसंद आया , आपका आभार

June 1, 2012

वह………………..क्या अंदाजे वयां है जनाब……………..! एकदम नए तरह से पेश किया है आपने इस समस्या को………………..

    चन्दन राय के द्वारा
    June 1, 2012

    अनिल भाई , आपके आने से मेरी रचना चेहरे पर जैसे बहार आया जाती है आप लोग अब जीवन का अभिन्न अंग हो

चन्दन राय के द्वारा
June 1, 2012

पवन मित्र , पाठक के विचार रचना के नगीने होते है , अच्छे शब्द हीरा, बुरे शब्द रचना को बदसूरत बना देते है , और आपने तो रचना को लाली लगा सुन्दर चमकदार बना दिया सरकार

pawansrivastava के द्वारा
June 1, 2012

बहुत खूब चन्दन जी …..क्या व्यंग्य का छौंका मारा है आपने

Mohinder Kumar के द्वारा
June 1, 2012

चन्दन जी, नारी विच सारी है कि सारी विच नारी है वाली हालत कर दी आपने… समझ नहीं आ रहा कि गड्डों में नेता हैं कि नेताओं के गड्डे हैं… लिखते रहिये.

    चन्दन राय के द्वारा
    June 1, 2012

    मोहिंदर साहब , यही तो भ्रष्ट लोगो की खूबी है की पता नहीं लगता भ्रष्ट कौन है इमानदार कौन , चेहरे पे चेहरा पहने है अपने सरकार , तो जब तक भ्रष्ट लोग है में तो इनका उपकार मानूंगा की इनकी जूता फजीहत करने का मौका मिलता रहेगा

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 1, 2012

इन गड्ढों की बात न पूछो . इनका सामाजिक परिवेश में ऊँचा स्थान है. गति नियंत्रित रहती है . दुर्घटना कम से कम. डिस्को डांस की मुफ्त प्रशिक्षण महिला अस्पताल पर कम बोझ, रास्ते में ही प्रसव. महिला को भी आराम , narmal प्रसव. खर्चा bacha. कई लाभ हैं. “वाह रे ! अनशन ,धरना के फैशन का दौर, सब है क्रांतिकारी साधू , डाकू,लुटेरा ,चोर ” !

    चन्दन राय के द्वारा
    June 1, 2012

    कुशवाहा जी , अब गड्ढो के उपकार पर लिखूंगा तो सच कह रहा गड्ढे इस कलम को भवसागर पार लगा देंगे , यमलोक इनने से गठजोड़ कर ले तो , आधी जाने गड्ढे अपने खाते से निकाल दे , हाथ टाँगे तोड़ बीमा राशि दिलवाने में जो उपकार गड्ढों का उसके महयोग्दान की तो कोई सानी नहीं आपका शुक्रगुजार सरकार

sadhna srivastava के द्वारा
June 1, 2012

हा हा हा …… सोलिड है….. एकदम सोलिड….. कानपुर की सडकों पे भी बहुत से बुड्ढे गड्ढे हैं….. :) :)

    चन्दन राय के द्वारा
    June 1, 2012

    साधना जी , आपको सोलिड लगा ,और आपने सबसे पहले अपने इतने सोलिड आपकी भाषा में विचार रखे , मन को बेहद सुकून मिला , हाँ अब इन गड्ढों ने जो दर्द सह है तो इसको आवाज देना तो जरुरी हो गया था आपका धन्यवाद


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