कलम...

{ "हम विलुप्त हो चुकी "आदमी" नाम की प्रजातियाँ हैं" / "हम कहाँ मुर्दा हुए हमें पता नहीं".....!!! }

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“खुदा की कमाई प्रिय तुम्हारा चेहरा”

Posted On 18 May, 2012 Others में

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ऩऱम ऩऱम मख़मऴ सी मुलायम  ,
भीजे चाँद क़ी भीगी चाँदनी
प्रिय तुम्हारा चेहरा   !


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सोकर उठी सुबह सी उज्जवल ,
ऩऩ्हे फूलो की हसँती क्यारी
प्रिय तुम्हारा चेहरा  !


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साँझ के आक़ाश सी कुछ कुछ,
कुछ  कुछ कच्ची माटी की पावऩ
मूरत प्रिय तुम्हारा चेहरा  !


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निम॑ल ओस सी ताजा,
मन्दिर की अलौकिक सजावट
प्रिय तुम्हारा चेहरा  !


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सोने के तारो से मढ़ी भौंहों के नीचे,
चाँद की चमचमाती
क्यारी प्रिय तुम्हारा चेहरा !


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खुदा की जिन्दगी भर की कमाई ,
ईश्वर का रूप प्रिय तुम्हारा चेहरा !




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419 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

मनु (tosi) के द्वारा
May 30, 2012

चन्दन जी सादर ! आजकल या यूं कहूँ कि आपकी रचनाओ से ये लगता है आप जल्दी ही अच्छे रचनाकारों कि छुट्टी करने वाले हैं … आपकी रचना मुझे बहुत अच्छी लगी … !!!बधाई

    चन्दन राय के द्वारा
    May 30, 2012

    मनु जी , मेरा किसी की छुट्टी का इरादा नहीं है, पर हाँ साहित्य में कुछ बड़ा करने का इरादा जरुर है , बस ये समस्या है की मेरा कोई मार्गदर्शक नहीं है , ये आपका उदारमन है , जो आप इतने मुक्तभाव से मेरी रचना को पसंद करती हैं

May 26, 2012

मुझे मत मरो मेरा क्या कसूर है………. http://satyaprakash.jagranjunction.com/2012/05/25/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%9D%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A4%A4-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8B-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B8/#comment-१२ किसी भी धर्म के लोग हो उन्‍हे आगे आकर इसका विरोध करना चाहिए और सरकार से भी निवेदन करना चाहिए कि इस तरह के कार्यक्रमो पर रोक लगायी जाय, मै आप सभी का आग्रह करना चाहता हुँ कि आप निम्‍न माबाईल न0 फोन कर इसे राकने का आग्रह करे जिलाधिकारी गोरखपुर 9454417544 आयुक्‍त गोरखपुर 9454417500 एस एस पी गोरखपुर 945440273 आई जी गोरखपुर 9454400209 एस पी आरए 9454401015 योगी आदित्‍यनाथ सांसद गोरखपुर 0551-2255454, 53

    चन्दन राय के द्वारा
    May 27, 2012

    अनिल मित्र , आपका यह समाजसेवी कदम अवश्य रंग लायेगा , में पहले यह लेख पढ़ लेता हूँ , फिर जो बन पडेगा अवश्य सहयोग करूंगा

    Charlee के द्वारा
    July 11, 2016

    Great hammer of Thor, that is pofulwelry helpful!

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
May 26, 2012

सुन्दर जजबात,चन्दन जी.

    चन्दन राय के द्वारा
    May 27, 2012

    झा साहब , आपको अच्छा लगा , कलम को उसका इनाम मिल गया आपका धन्यवाद

sadhna srivastava के द्वारा
May 26, 2012

वाह वाह….. अति सुन्दर… :)

    चन्दन राय के द्वारा
    May 26, 2012

    साधना जी , आपके ह्रदय से निकले वाह के बोल , आज कागज कलम दवात सब जश्न में हैं

priyasingh के द्वारा
May 25, 2012

..पहले रात फिर सुबह फिर सांझ फिर मंदिर फिर खुदा…….. हर एक रूप में अपने प्रिय का अच्छा बखान किया है आपने ……….उत्तम प्रस्तुति………..

    चन्दन राय के द्वारा
    May 26, 2012

    प्रिया जी , आपको मेरी प्रियतम के हर रूप पसंद आये , आपका धन्यवाद

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 25, 2012

आदरणीय jj , नमस्कार आज सुबह से आलेख “अन्ध्रेरे के आधार पर विकास करता झारखण्ड ” जिसने आपने featured ” में डाला हुआ है जिसे सुश्री खुसबू जी ने अपने विचार कह के पोस्ट किया हुआ है … वो पूरा का पूरा आलेख टाइप (चोरी ) किया हुआ है प्रथम पैर को छोड़ के … सीर्फ आकड़ा होता तो मैं आपके संज्ञान में नहीं लाती क्योंकि इस तरह के आलेख के लिए आकडे कहीं न कहीं से उठाने होते है . पर चुकी महोदया ने पूरा आलेख ही चोरी का टाइप कर दिया है और संदर्भ भी नहीं दिया है … तो सवाल उठाना स्वाभविक है / आपके जानकारी के लिए बता दू इस आलेख की लेखिका अनुपमा जी है .. जो मर्ज कुछ , दवा कुछ ” के नाम से “तहलका ” के अंक 31may2012 में प्रकाशित है पेज 40-41 में .. चूँकि आप ने सुबह से इसे फीचर किया हुआ है और कल को आप इसे बेस्ट ब्लॉग अफ डी विक भी कर देंगे … तो जानना चाहती हूँ आपकी नजर में ये कहाँ तक उचित है .. क्या जो अपनी स्वरचित और लिखित लेख लिखते हैं क्या उनके साथ नाइंसाफी नहीं होगी .. तो फिर हम भी क्यों मेहनत करे … http://kg16.jagranjunction.com/2012/05/23/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%b0

    चन्दन राय के द्वारा
    May 26, 2012

    महिमा जी , पिछले कुछ दिनों से मुझे बड़ा दुःख होता है इस मंच को लेकर , हालांकि में व्यक्तिगत चीजो में पड़ना नहीं चाहता , पर फिर भी हमे अपनी रचनाधर्मिता का ध्यान रखना चाहिय ,हम कान्हा तक जान सकते है या जान पाएंगे की कौन सच्चा है कौन झूठा , बस इतना ही कन्हुगा

follyofawiseman के द्वारा
May 25, 2012

लबों पे फूल खिलते हैं किसी के नाम से पहले दिलों के दीप जलते हैं चराग़-ए-शाम से पहले कभी मंजर बदलने पर भी किस्सा चल नहीं पाता कहानी ख़तम होती है कभी अंजाम से पेहले

    चन्दन राय के द्वारा
    May 26, 2012

    संदीप मित्र , हमारे भी आपके नाम के ही घनिष्ट मित्र है या यूँ कहिय की लंगोटिया यार ,तो जब भी आप इधर आते है उस मित्र की याद आ जाती है , आपकी शायरी के क्या कहने

    follyofawiseman के द्वारा
    May 26, 2012

    sorry main shayri ko quote krna bhul gaya…..mainne bas use kiya hai likha kisi or ne hai….. हमारे भी आपके नाम के ही घनिष्ट मित्र है या यूँ कहिय की लंगोटिया यार ,तो जब भी आप इधर आते है उस मित्र की याद आ जाती है ,- wo aapke mitr hain to ham kya shatru hain…..kya aap bhi…mere bahane unko yaad karten hain or hame bhul jate hain…ye bhi khoob rahi

pawansrivastava के द्वारा
May 25, 2012

चन्दन जी जिस शिद्दत से आपने अपनी प्रियतमा का रूप बखान किया है ,मेरा मन भी ऐसा हीं कुछ करने को आंदोलित हो गया …..चलिए मैं भी कुछ आप सा लिखने की कोशिश करता हूँ : तेरे केशु जैसे अमर-लताओं का कानन कुंज तेरा वर्ण जैसे चंद्राभ का रश्मि -पुंज तेरी सांसे जैसे फूलों का सुभग सुवास तेरी बाहें जैसे उत्कट उपले से कपास तेरी आँखें जैसे मनमत्त मस्त से मृग नयन तेरी काया जैसे चंचल चपला सा चित्तवन तेरा कपाल जैसे उध्ला उन्नत सा धवल तेरा मन जैसे खेल रहा कोई बाल नवल तेरे होंठ जैसे तीखे सरोवर का कछार तेरी नाक जैसे उदग्र उन्नत सा उभार तेरी कटी जैसे लचीली सी डाली हरी तेरे कपोल जैसे गुलाबों की सुर्खई भरी तेरी वाणी जैसे मिश्री का मधुर घोल तेरी चाल जैसे सर्प रहा हो कोई डोल

    चन्दन राय के द्वारा
    May 26, 2012

    पवन जी मित्र , कंही इतनी सुन्दर प्रिया का पता इन्द्रदेव को लग गया , तो कंही वो आपकी प्रीतम का अपहरण कर स्वर्गलोक ना ले जाए , फिर आप बठे रहीय रोते , तो मित्र जग बड़ा बेरी है , यूँ अपनी प्रियतम का सबके सामने जो इतना अतिसुन्दर रूप कहेंगे , तो भैया आपकी प्रीतम के सामने आप्शन भी बहुत होंगे ,

D33P के द्वारा
May 20, 2012

चन्दन जी जब प्यार सर चढ़ कर बोलता है तो बस  … जहाँ देखू जिधर देखू तेरा चेहरा नज़र आये …….

    चन्दन राय के द्वारा
    May 21, 2012

    दीप्ती जी , यह सत्य है जब प्यार होता है तो जेठ की दुपहरी भी किसी शीतल कानन कुञ्ज की बसंत बयार सा लगता है , और शिशिर की ठंडक भी बदन जलती है जब प्रेम टूटने की कगार पर होता है आप के सुन्दर भावो के लिए तहे दिल से शुक्रिया

utkarsh singh के द्वारा
May 20, 2012

चन्दन जी , सुन्दर रचना के लिए साधुवाद | आपकी कविता को पढ़ कर स्व. धर्मवीर भारती की प्रेम कविताओं की याद आ गयी |

    चन्दन राय के द्वारा
    May 21, 2012

    उत्कर्ष मित्र , हम कन्हा इस काबिल , ये तो आपका बड़प्पन है जो आप इतने महान कवी का नाम भी ले रहे हैं , आपके शब्द दिल को हमेशा याद रहेंगे , इतने मुक्तभाव से प्रशंशा कर पाने का इल्म बहुत कम लोगो में होता है

आर.एन. शाही के द्वारा
May 20, 2012

किसी प्रेमी की नज़र से प्रिय का चेहरा जैसा नज़र आता है, उसकी उपमा चाँद-तारों सहित किसी भी ज्ञात चीज़ से देना दरसल दिल बहलाने का एक ज़रिया ही है । उस दिव्य एहसास को कोई उपमा नहीं दी जा सकती, बस एक एहसास ही होता है । जब दिल प्रिय से उचट जाता है, उसके बाद ही उपमा फ़िक्स की जा सकती है । आपके प्रेमी हृदय को सलाम !

    चन्दन राय के द्वारा
    May 20, 2012

    शाही साहब , जब प्यार होता है तब प्रियतम को कहने वाली सारी बाते , स्वत ही ये सुन्दर उपमा रूप धारण कर लेती हैं , उसमे कोई बनावट नहीं होती , यूँ ही लोग शायर , कवी नहीं हो जाते और निचे दिनेश साहब ने भी यही बात दोहराई है , और यदि दिल उचट जाये तो वो प्रेम नहीं है , और दिल उचट जाता है , तो कोई सुन्दर बात नहीं कहता , फिर भी आपके विचारो और नजरिये का सम्मान

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 20, 2012

मित्र चन्दन जी, नमस्कार वाह………..लगता है आपको इश्क हो चला है आज कल प्यार भरे नगमें सूना रहें है आप…………..अगर ऐसी कोई बात हो तो बताइयेगा बहुत ही मीठी रचना और क्या कहूँ देर से आने के लिए क्षमा पढ़ तो पहले ही लिया था

    चन्दन राय के द्वारा
    May 20, 2012

    आनंद मित्र , नहीं बस प्रेम करके पंडित बने तो समय बीत चुका , बस सोचा जब मंच पर इतनी मशीनी बाते हो रही है तो क्यूँ ना प्यार से थोडा सबका मन बहलाऊं , और मित्र मुझे कमेंट्स से इतना ही फर्क होता है की मेरी बाते आप तक नहीं पहुच नहीं पाई , कैसा लगा आपको , कमेंट्सAI कोई मायने नहीं रखते , और मित्र क्षमा मांग कर मुझे शर्मिन्दा ना करे , आप लोग जो सम्मान देते है वो बहुत है

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 20, 2012

बहुत खूब चन्दन बाबू. सुन्दर प्रस्तुति बधाई…..

    चन्दन राय के द्वारा
    May 21, 2012

    अजय मित्र , आपका कोटिश धन्यवाद

yogi sarswat के द्वारा
May 20, 2012

साँझ के आक़ाश सी कुछ कुछ, कुछ कुछ कच्ची माटी की पावऩ मूरत प्रिय तुम्हारा चेहरा बहुत सुन्दर पंक्तियाँ , मित्रवर चन्दन राय जी !

    चन्दन राय के द्वारा
    May 21, 2012

    योगी मित्र , आपको अच्छा लगा , कलम को उसका इनाम मिल गया

vinitashukla के द्वारा
May 20, 2012

सुन्दर भाव युक्त रचना. बधाई.

    चन्दन राय के द्वारा
    May 21, 2012

    विनीता जी , आपको रचना पसंद आई , मेरी लेखनी सफल

rekhafbd के द्वारा
May 20, 2012

चंदन जी , खुदा की जिंदगी भर की कमाई , ईश्वर का रूप प्रिय तुम्हारा चेहरा | अति सुंदर भाव ,बधाई

    चन्दन राय के द्वारा
    May 20, 2012

    रेखा जी , आपके विचार ही तो मेरा आइना हैं , आप जब अपने विचार रखते है तो लगता है कलम को भी की उसकी मेहनत रंग लाइ आपका तहे दिल से आभार

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 20, 2012

प्रिय चन्दन ji, सस्नेह प्रिय तुम्हारा चेहरा. ऐसा ही लिखते रहें बंधेगा एक दिन सेहरा बधाई पे नहीं पहरा बधाई.

    चन्दन राय के द्वारा
    May 20, 2012

    कुशवाहा जी , आपकी दुआ रंग लाएगी इक सोनी फिर महिवाल के घर आएगी आपकी उपस्थिति मेरे मंच में जादा नगीना है

Piyush Kumar Pant के द्वारा
May 20, 2012

बहुत बढ़िया प्रस्तुति……..

    चन्दन राय के द्वारा
    May 20, 2012

    पन्त साहब , आपको अच्छा लगा , कलम को उसका इनाम मिल गया

dineshaastik के द्वारा
May 20, 2012

आदरणीय  चंदन जी आपकी रचना पढ़कर कल  का उद्धरण  पेश  कर रहा हूँ। कल  मेदान्ता होस्पिटल  में एक  मूर्ति पूजक  पुजारी से भेंट  हो गई। उनका तर्क  था कि मूर्ति पूजा इसलिये करते हैं कि मूर्ति सुन्दर होती है उसका श्रृंगार उसकी तरफ  हमें और  आकर्षित  करता है। इससे हमारा मन  ईश्वर से भटकता नहीं है। मैने कहा फिर तो हमें अपनी प्रेमिकाओं  की पूजा करना चाहिये क्योंकि वह हमें अधिक  खूबसूरत  लगती हैं। उनकी पूजा करने से उनकी कृपा भी आसानी से उपलब्ध  हो जायेगी। इस  संबंध  मे घनानन्द की एक  कहानी भी है।  एक  राजा के यहाँ घनानन्द  नाम  का कवि खजान्ची पद पर सुशोभित  था वह एक  सुजान नाम की राजनर्तकी से प्यार करता था। उस  नर्तकी की वजह से राजा ने उसे राज्य से निष्काषित  कर  दिया। वह सुजान के पास  गया, सुजान  ने साथ  चलने से मना कर  दिया, सुजान  ने कहा मैं तु्मसे नहीं बल्कि राज्य के खजान्ची से प्रेम करती थी, अब तुम  खजान्ची नहीं रहे। घनानन्द अकेले ही मथुरा चले गये और सुजान को ईश्वर मानकर काव्य सृजन करने लगे। यह सच्ची घटना है और बहुत ही मार्मिक। आपकी अपनी मासूका के प्रति प्रेम को देखकर घनानन्द की कहानी याद आ   गई।

    चन्दन राय के द्वारा
    May 20, 2012

    दिनेश जी , यही तो सच्चे प्यार की खूबी कुछ ना कुछ देता ही है लेता कुछ नहीं है , देखीय घनानंद साहित्यकार हो गए , आपने इतनी सुन्दर कथा से अपने विचार रखे प्रभु मन गद गद हो गया

jyotsnasingh के द्वारा
May 19, 2012

प्रिय चन्दन जी इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा —- ज्योत्स्ना.

    चन्दन राय के द्वारा
    May 20, 2012

    ज्योत्स्ना जी , आप कान्हा गायब हो गयी , मंच पर उपस्थिति कम हो गई है , आपने गुनगुनाकर अपने विचार रखे धन्यवाद

sinsera के द्वारा
May 19, 2012

चन्दन जी ,मुझे आपकी ख़ूबसूरत सी ग़ज़ल से वो ग़ज़ल याद आ गयी… चाँदी जैसा रूप है तेरा सोने जैसे बाल, एक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल..

    चन्दन राय के द्वारा
    May 20, 2012

    सरिता जी, यही तो दिल की खासियत है , जुबान की जरुरत नहीं यंहा जज्बात मिल जाते है ,आपने अपने सुन्दर गजल से मेरी रचना में सुर मिलाया बहुत अच्छा लगा

akraktale के द्वारा
May 19, 2012

चन्दन जी नमस्कार, बहुत खूब, हर शेर में नयी उपमा क्या बात है. बधाई.

    चन्दन राय के द्वारा
    May 20, 2012

    अक्रक्ताले जी, आपकी हर बात सोना है , और आपकी उपस्थिति मेरे मंच पर लगा नगीना

div81 के द्वारा
May 19, 2012

वाह बहुत खूब…………… अच्छा लगा आप की प्रिय का चेहरा :)

    चन्दन राय के द्वारा
    May 20, 2012

    दिव्या जी , आपको अच्छा लगा , कलम को उसका इनाम मिल गया

vikramjitsingh के द्वारा
May 19, 2012

प्रिय चन्दन भाई… दो शब्द आपकी इस शानदार रचना पर….गौर फरमाइए……. ”सीरत के हम गुलाम हैं…सूरत हुई तो क्या…. सुर्ख-ओ-सफ़ेद माटी की….मूरत हुई तो क्या….”

    चन्दन राय के द्वारा
    May 20, 2012

    विक्रम जी , में तो इतना कन्हुंगा इक था सजन मंदिर में , और इक प्रीतम मस्जिद में प्रेम के रंग में ऐसी डूबी बन गया इक ही रूप प्रेम की माला जपते जपते आप बनी में श्याम आप कान्हा गायब हो गए , मंच पर उपस्थिति कम हो गई है

shashibhushan1959 के द्वारा
May 19, 2012

आदरणीय चन्दन जी, सादर ! बहुत सुन्दर ! अलग-अलग पंक्तियों में अलग-अलग भाव ! प्रेम की पराकाष्ठा ! बहुत सुन्दर !

    vikramjitsingh के द्वारा
    May 19, 2012

    प्रिय शशि जी……प्रणाम बड़े भाई….

    चन्दन राय के द्वारा
    May 20, 2012

    शशि जी , हम तो उसके लिए जन्हा लुटा दे , ये और बात है इस जन्हा पे खुदा का हक है , आपकी उपस्थिति मेरे मंच में जादा नगीना है

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 20, 2012

    आदरणीय विक्रम जी, सादर ! आपकी उपस्थिति अच्छी लगी ! रचना के साथ और अच्छी लगती !

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
May 19, 2012

मित्र चन्दन जी, बहुत ही शानदार रचना……………………. एक आशिक अपनी माशूक को इस कदर प्यार कर सकता है कि कुदरत कि सारी संज्ञाएँ दे दे ………….. बहुत खूब……………… अति सुन्दर……….

    चन्दन राय के द्वारा
    May 20, 2012

    अंकुर मित्र , वो आशिक ही नहीं जिसे महबूबा में खुदा ना दिखे , वो ही दीवाना है जो मुहब्बत में अपनी जान दे दे आपके शब्द फुल मंच को महका रहे धन्यवाद

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 19, 2012

खुदा की जिन्दगी भर की कमाई , ईश्वर का रूप प्रिय तुम्हारा चेहरा !.. अतिसुंदर चन्दन जी , प्रेम की पराकाष्ठ ता का सुंदर चित्रण … जब प्रेमी को अपने प्रेमिका सबसे सुंदर लगती है .. बधाई आपको

    चन्दन राय के द्वारा
    May 19, 2012

    महिमा जी , यह प्रेम की खूबी है की यदि कोई प्रेमी है तो उसे प्रियतम के आगे सबकुछ बेकार लगता है , और प्रियतम सर्वेसर्वा लगती है , जब तक प्रेम असाधारण और दीवानगी की हद तक ना हो , यह समय की बर्बादी है

minujha के द्वारा
May 19, 2012

चंदन जी  आपकी रचना पढकर मुझे याद आगया- जाके मन में सूरत जैसी प्रभू मूरत   दिखे है वैसी……,  प्रियवर  के प्रति हर  किसी के मन  में ऐसे ही ही होंगे,बधाई 

    चन्दन राय के द्वारा
    May 19, 2012

    मीनू जी , आप तो मुझे गूढ़ विद्वान् लगती हैं , हर बात को झट से पकड़ लेती हैं , और उतने ही सुन्दर भावो से रचना का चित प्रसन्न कर देती हैं , और हर रचनाकार को यही तो लोभ होता है

Rajesh Dubey के द्वारा
May 19, 2012

मनुष्य का चेहरा ही तो सब कुछ है. किसी से मिलने पर पहले चेहरा से ही उसके बारे में अंदाज लगाया जाता है. और प्रिय का चेहरा तो जिंदगी भर की कमाई है.

    चन्दन राय के द्वारा
    May 19, 2012

    दुबे जी , आपने तो बड़ी ही विवेचना पूर्वक बात रखी और उन भावनाओं को समझा , आपने सुन्दर शब्दों के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया

nishamittal के द्वारा
May 19, 2012

सुन्दर प्रस्तुति चन्दन राय जी.

    चन्दन राय के द्वारा
    May 19, 2012

    निशा जी , आपको भावनाए पसंद आई आपका शुक्रिया

shiromanisampoorna के द्वारा
May 19, 2012

आदरणीय चन्दन जी, सादर श्री राधे भावों से युक्त अतिसुन्दर रचना के liye बहुत-बहुत बधाई…………………../

    चन्दन राय के द्वारा
    May 19, 2012

    शिरोमणि संपूर्ण जी , आपको भावनाए पसंद आई आपका शुक्रिया

rajkamal के द्वारा
May 18, 2012

प्रिय खुशबूदार चन्दन जी ….. सप्रेम नमस्कारम ! यहाँ पर मैं खुद को दुविधा में पाता हूँ की उसके चेहरे में खुदाई कमाई को पाकर आपने भक्ति छोड़ दी है या फिर जब भी उसको देखते हो खुदा याद आ जाता है ? बेहतरीन रचना पर मुबारकबाद

    jlsingh के द्वारा
    May 19, 2012

    प्रश्न सार्थक है उत्तर तो देनी पड़ेगी!

    चन्दन राय के द्वारा
    May 19, 2012

    राजकमल जी , आपकी कही दोनों बाते सच है , बस इतना ही कहूंगा , कैसे ना कंहू तुम्हे अपना खुदा जन्हा देखता हूँ तुम ही तुम हो

    चन्दन राय के द्वारा
    May 19, 2012

    जवाहर साहब , आशा है आप मेरे उत्तर से संतुष्ट होंगे

D33P के द्वारा
May 18, 2012

खुदा की जिन्दगी भर की कमाई , ईश्वर का रूप प्रिय तुम्हारा चेहरा ! खूबसूरत .खूबसूरत .खूबसूरत .

    चन्दन राय के द्वारा
    May 19, 2012

    दीप्ती जी , आपको भावनाए पसंद आई आपका शुक्रिया शुक्रिया शुक्रिया शुक्रिया

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
May 18, 2012

सुन्दर काव्यात्मक प्रस्तुति , चन्दन जी,……. अनेकशः बधाई ! पुनश्च !!

    चन्दन राय के द्वारा
    May 19, 2012

    आचार्य साहब , आपको भावनाए पसंद आई आपका शुक्रिया

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
May 18, 2012

सोकर उठी सुबह सी उज्जवल , ऩऩ्हे फूलो की हसँती क्यारी प्रिय तुम्हारा चेहरा ! सोने के तारो से मढ़ी भौंहों के नीचे, चाँद की चमचमाती क्यारी प्रिय तुम्हारा चेहरा ! बहुत सुन्दर चन्दन जी …आप का प्रेम परवान चढ़े …प्रभु वहीं हैं जहां मन रमे …..खूबसूरत .. भ्रमर ५

    rajkamal के द्वारा
    May 18, 2012

    Waah भ्रमर जी वाह ! जवाब नहीं है आपका भी खुशबूदार चन्दन जी का प्यार परवान चढे और बाकि का जाए ….. में ?…..

    चन्दन राय के द्वारा
    May 19, 2012

    भ्रमर साहब , प्रेम तो परवान चढ़ के उतर भी गया गुरुदेव , और ना जाने कितने प्रेम परवान चढ़े और और उतर गय, अब आपकी दुआ फिर रंग लाएगी , फिर कोई हीर हमसे दिल लगाएगी


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