कलम...

{ "हम विलुप्त हो चुकी "आदमी" नाम की प्रजातियाँ हैं" / "हम कहाँ मुर्दा हुए हमें पता नहीं".....!!! }

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"ख़ारिज कीजिए शौक से मेरी मुहब्बत"

Posted On: 13 May, 2012 Others में

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ख़ारिज कीजिए शौक से मेरी मुहब्बत , गिराइए अदब नजरो से,

जो रूह्तलक जुड़ गया तेरे मेरे रूह का रिश्ता , उसे कैसे कर पाओगे ख़ारिज !

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बयां करेंगी तुम्हारी करवटे , केशुओं की महक, , माथे का शिकन,

आइना जो यकीं दिलाएगा तेरी गिरफ़्तारी , उसे कैसे कर कर पाओगे ख़ारिज !

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रस्म ए उल्फत यही तो आ बैगरत , सीने मे खंजर उतार दे,

जी कर क्या करेंगे पत्थर दिल , जो तुने हमे कर दिया ख़ारिज !

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तेरा खंजर भी जो पा  सके तो , मौत खुशगवार निकाह सी  होगी,

कब्र से पुकारा करूँगा तेरा नाम , कब तक मेरी दीवानगी करोगे ख़ारिज !

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न मान यकीं जालिम मेरी मुहब्बत का, चन्दन फकीर तेरी मुहब्बत मे,

जो फ़रिश्ते उतर आस्मां से बतलायेंगे, तो कैसे कर पाओगे ख़ारिज !

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जब आंख  से  गिरेगा मेरे नाम का मोती, कलेजा प्रेमपुकार लगाएगा,

तड़प के तब सरेबाजार करोगे इकरार--चन्दन,अभी ज़माने से डरे करते हो ख़ारिज


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ऊपर लिखी गजल इक आशिक की है , जो अपनी महबूबा से अपने जज्बात कह रहा है ,

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और आज क्यूंकि mother’s day इसलिए निचे लिखी दो पंक्तियाँ माँ को समर्पित है

In love of  my mother , she  is far away from me in her native village,

Herewith ,i am  posting few lines of my poem for her ,

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मै रात रोया था माँ कटोरे भर आंसू ,

मुझे आज मेरी माँ, तू बहुत याद आई थी !

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223 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ajaykr के द्वारा
July 2, 2012

चन्दन भाई ,कही मैंने पढ़ा था …..महबूबा आशिक के बारे में कहती हैं …. उसने दिन रात मुझको सताया इतना की, नफरत भी हो गई और मोहब्बत भी हो गई | उसने इस नजाकत से इन होठो को चूमा, की रोज़ा भी ना टुटा और अफ्तारी भी हो गई || उसने इस एहतराम से मुझसे मोहब्बत की, की गुनाह भी ना हुआ और इबादत भी हो गई | मत पूछ उसके प्यार करने का अंदाज़ कैसा था, उसने इस सिद्दत से सिने से लगाया की मौत भी ना हुई और जन्नत भी मिल गई…!! माँ को समर्पित पंक्तिय अच्छी हैं

panditsameerkhan के द्वारा
May 19, 2012

चन्दन भाई….कोई बेगैरत, कम अक्ल ही होगा जो आपको खारिज करे, वर्ना आप तो बस नोटिस ही करने लायक है….बहुत सुन्दर पंक्तियाँ है आपकी…

    चन्दन राय के द्वारा
    May 20, 2012

    पंडित खान जी , ये आप की मुहब्बत है जो ज़िंदा रखती है कलम को , लोग तो खंजर लिए आस्तीन में फिरते हैं

akraktale के द्वारा
May 15, 2012

चन्दन जी नमस्कार, तेरा खंजर भी जो पा सके तो , मौत खुशगवार निकाह सी होगी, कब्र से पुकारा करूँगा तेरा नाम , कब तक मेरी दीवानगी करोगे ख़ारिज ! सुन्दर गजल/ बधाई. माँ की जुदाई का गम और ये आंसू, कभी समझ ना पाया ये जुदाई की रातें इतनी लम्बी होती क्यूँ हैं.

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    अक्रक्ताले , आपका आगमन बसंत की तरह मन को बाग़ बाग़ करता है , आपके शीतल शब्द गर्मी बढ़ाती इस व्यवस्था में उपचार है

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    श्री मान जल्दी में आपके नाम के आगे जो जी टाइप किया था वो रह गया क्षमा प्रार्थी हूँ

Piyush Kumar Pant के द्वारा
May 14, 2012

मै रात रोया था माँ कटोरे भर आंसू , मुझे आज मेरी माँ, तू बहुत याद आई थी ! अंतिम पंक्तियों ने बहुत प्रभावित किया……… बहुत सुंदर भाव ……… इंसान के जीवन मे वक्त बदलता है…… किस्मत बदलती है……. हर चीज़ बदल ही जाति है क्योकी बदलाव ही प्रकृति का शाश्वत नियम है……. पर इस नियम को झुठलाती हुई माँ कभी नहीं बदलती………..

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    पन्त जी , आप से कुछ समय से रूबरू हुआ , आप सज्जन व्यक्ति है , आपके शब्दों ने मुझे आपका ऋणी कर दिया

rajkamal के द्वारा
May 14, 2012

प्रिय खुशबूदार चन्दन जी ….. सप्रेम नमस्कारम ! मेरे थाणे में आपके खिलाफ इस बात की शिकायत आई थी की आप अपनी पोस्ट पर प्राप्त प्रतिकिर्याओ का उत्तर देने का कष्ट नहीं करते है ……. आपको आपकी जिम्मेवारी का एहसास करवाने के लिए ही जानबूझकर इस प्रकार की हरकत की गई थी ….. अभी भी पूरा सुधार होना बाकी है ….. आपमें परिवर्तन लाने के लिए आगे भी प्रयास जरी रहेंगे आधा आभार आधी बात मानने के लिए

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    राजकमल जी , मेरे लिए ज्यादा जरुरी उन्ही बुद्धिजीवी लेखको के आलेखों पर अपने विचार रखना है , और में हमेशा ही हर बात का रेपली भी देने की कोशिश करता हूँ , पर कई दफा समय ना होना , मुझे यहाँ तक आने नहीं दे पाता, में चाहता हूँ में हर नै लेख पर अपने विचार रखूं , में किसी स्वार्थ में ऐसा नहीं करता , कई मित्र मेरे लेख पर अपने विचार नहीं रखते फिर भी में बेहिचक उनपे अपने विचार रखता हूँ ,

आर.एन. शाही के द्वारा
May 14, 2012

चन्दन जी, आपकी गज़लकारी प्रभावित करने वाली है, बधाई ! कितना अच्छा होता यदि आप ओपेनबुक्सआनलाइन डाँट काम ज्वाइन कर लेते । वहाँ गज़लों के क़द्रदान और प्रशिक्षक दोनों बहुतायत में मौज़ूद हैं । कक्षाओं में गजल की बारीकियाँ और तकनीक सिखाई जाती है । फ़िलहाल हमारे वाहिद मियाँ वहीं भर्ती हैं और तालीमात हासिल कर रहे हैं । यदि कभी उधर जाएँ तो उन्हें हमारा सलाम ज़रूर कहियेगा । आदाब !

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    शाही साहब , मुझे इक बहुत बड़ा साहित्यकार बनना है ,पर क्यूंकि में ENGINEER हूँ इसलिय जॉब से समय निकलकर ,वक़्त निकाल पाटा हूँ , आपने मेरा निस्वार्थ भाव से जो मार्गदर्शन किया , उसके लिए में आपका ऋणी हूँ , मेने आपके बारे में सुना था , निश्चित ही आप एक सद्गुणी इंसान हैं , आपका आभार

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    May 15, 2012

    प्रिय चन्दन जी, सस्नेह. आदरणीय शाही जी की सलाह नेक है. मैं भी सहमत.

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    कुशवाहा जी , आपकी सलाह का अनुकरण करने की कोशिश करूंगा

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
May 14, 2012

क्या बात है मित्र, क्या मुझसे नाराज़ हो, आजकल मेरे ब्लॉग पर नहीं आ रहे हो. मेरी दो रचनाएँ आपकी प्रतिक्रिया का बेसब्री से इंतजार कर रही है.

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    मित्र अंकुर , में आपकी बातो से आहात नहीं हूँ , कृपा आगे भी खुल के अपने विचार रखे , मुझे अपनी आलोचनात्मक प्रतिकिरिया बेहद पसंद है समय की कमी है ,पर में आप तक हर बार की तरह जरुरर पहुचुन्गा

alkargupta1 के द्वारा
May 14, 2012

चन्दन जी , बहुत बढ़िया गजल…. और माँ के प्रति कहीं गयीं दो भावपूर्ण पंक्तियों में माता के वात्सल्य की गंगा उमड़ पड़ी….अति सुन्दर

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    अलका मेम, में चंद लेखको को अपने मंच पर सबसे ज्यादा जिनकी कमी महशुश करता हूँ उनमे आप भी है , आपक का होना और विचार रखना ही मेरी रचना का सही आकलन है , आपका कोटि कोटि आभार

yogi sarswat के द्वारा
May 14, 2012

न मान यकीं जालिम मेरी मुहब्बत का, चन्दन फकीर तेरी मुहब्बत मे, जो फ़रिश्ते उतर आस्मां से बतलायेंगे, तो कैसे कर पाओगे ख़ारिज ! मित्रवर चन्दन जी , ऐसी पंक्तियाँ सुनकर तो कोई भी मुहब्बत को खारिज नहीं करने वाला ! बहुत खूब !

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    योगी मित्र , में चंद लेखको को अपने मंच पर सबसे ज्यादा अपनापन महशुश करता हूँ उनमे आप भी है , आपक का होना और विचार रखना मन को सुकून देता है ,

sadhna के द्वारा
May 14, 2012

ख़ारिज कीजिए शौक से मेरी मुहब्बत , गिराइए अदब नजरो से, जो रूह्तलक जुड़ गया तेरे मेरे रूह का रिश्ता , उसे कैसे कर पाओगे ख़ारिज !! बहुत खूब चन्दन जी…….

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    साधना , आपका मंच पर सुस्वागत , आपको पंक्तियाँ सुन्दर लगी , अच्छा लगा

follyofawiseman के द्वारा
May 14, 2012

आपकी ये लाइन , ”ख़ारिज कीजिए शौक से मेरी मुहब्बत ,” बहुत ही खूबसूरत है………बाँकी कुछ खास नहीं है…..पहला लाइन देख कर ऐसा लगता है जैसे कहीं और से आप पर उतरा हो…पर बाँकी जबरदस्ती का लगता है…

    sinsera के द्वारा
    May 14, 2012

    मेरी आहों की जुबान कोई समझता कैसे, ज़िन्दगी इतनी दुखी मेरे सिवा किस की थी…

    चन्दन राय के द्वारा
    May 14, 2012

    मित्र, बहुत सा फीका चखा बहुत सा मीठा चखा , बेस्वाद होने लगा था कंठ आपके खट्टे से मजा आ गया , तो मित्रवर आप खट्टे का कोटा तयार रखे , आपने मेरे खट्टे की भूख बढा दी है

    चन्दन राय के द्वारा
    May 14, 2012

    सरिता जी , ये गर्म रात , ये चुभते कांटे ये आवारगी , ये नींद का बोझ , में अपने शहर गर होता , तो अपने घर चला जाता

    follyofawiseman के द्वारा
    May 14, 2012

    सरिता जी,  हर आन यहाँ सेहबा-ए-कुहन एक साघर-ए-नौ में ढलती है कलियों से हुस्न टपकता है, फूलों से जवानी उबलती है दुनियाँ एक ही है देखने के ढंग अनेक है…..पसंद अपनी अपनी…….!

    follyofawiseman के द्वारा
    May 14, 2012

    “कुछ तो है बात के तहरीरों में तासीर नहीं, झूठें फनकार नहीं है तो कलाम  झूठे है….” मैंने तो शुद्ध बंगाली रसगुल्ला दिया था वो भी खट्टा लगा….., फिर से चख के देखिए….शायद स्वाद समझ मे आए….

    sinsera के द्वारा
    May 14, 2012

    इस गुल    कदह पारीना में फिर आग भड़कने वाली है फिर अब्र गरजने वाले हैं, फिर बर्क कड़कने वाली है जो अब्र यहाँ से उट्ठेगा, वो सारे जहाँ पर बरसेगा हर जू-ए-रवान पर बरसेगा, हर को-ए-गराँ पर बरसेगा हर सर्द-ओ-समन पर बरसेगा, हर दश्त-ओ-दमन पर बरसेगा खुद अपने चमन पर बरसेगा, गैरों के चमन पर बरसेगा हर शहर-ए-तरब पर गुजरेगा, हर कसर-ए-तरब पर कड़केगा ये अब्र हमेशा बरसा है, ये अब्र हमेशा बरसेगा

    follyofawiseman के द्वारा
    May 15, 2012

    आ आ कर हजारों बार यहाँ खुद आग भी हमने लगाई है फिर सारे जहाँ ने देखा है येह आग हमीं ने बुझाई है

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    मित्र WISE मन, में आपकी बातो से आहात नहीं हूँ , कृपा आगे भी खुल के अपने विचार रखे , मुझे अपनी आलोचनात्मक प्रतिकिरिया बेहद पसंद है

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    WISEMAN MITR , हमे उस मय से नहीं मतलब दिल जिससे हो बेगाना मकसूद है उस मय से , दिल ही में जो खिचती है

    Bubby के द्वारा
    July 11, 2016

    Well done arlitce that. I’ll make sure to use it wisely.

Rajesh Dubey के द्वारा
May 14, 2012

हर एक शेर दमदार. चन्दन की फकीरी मुहबत की है, शानदार.

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    दुबे साहब , आपको पसंद आया , मन को अच्छा लगा ,मनोबल मिला

shashibhushan1959 के द्वारा
May 14, 2012

आदरणीय चन्दन जी, सादर ! इश्क और मुहब्बत —- स्नेह और वात्सल्य…. एक ही साथ ! जय हो ! जय हो !

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    शशि जी , आपने मेरा गुणगान कर दिया , समझो पप्पू पास हो गया , आपका आभार

nishamittal के द्वारा
May 14, 2012

चन्दन जी आपकी ये पंक्तियाँ बहुत भावपूर्ण और सुन्दर लगी मै रात रोया था माँ कटोरे भर आंसू , मुझे आज मेरी माँ, तू बहुत याद आई थी माँ को भावपूर्ण श्रद्धांजली

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    निशा जी , यही तो माँ की खूबी है , माँ पर लिखा हर शब्द सुन्दर हो जाता है , आपका आभार

dineshaastik के द्वारा
May 14, 2012

मै रात रोया था माँ कटोरे भर आंसू , मुझे आज मेरी माँ, तू बहुत याद आई थी ! चंदन जी उपरोक्त अतिशयोक्ति पूर्ण  पंक्तियाँ सचमुच  ही बहुत ही सुन्दर बन पड़ी हैं। लेकिन  क्षमा चाहता हूँ कि सच्ची आशिकी के सांसारिक  अनुभव से वंचित  रहा या  अपने आपको वंचित  रखने का प्रयास  किया।  अतः उन पर सार्थक  प्रतिक्रिया देना मेरे लिये उचित  नहीं होगा। जिसका अनुभव न  हो उसपर सही विचार दे सकना किसी के लिये भी संभव नहीं है। कह तो मैं भी सकता  हूँ कि बहुत  ही सुन्दर, लजवाब, खूबसूरत, बेहतरीन , किन्तु झूठ  बोलने के सामर्थ से वंचित  हूँ।

    चन्दन राय के द्वारा
    May 15, 2012

    दिनेश जी , आपके सत्य वचनों को पढ़कर मन प्रसन्न हो गया , आप ऐसे मेरा मार्गदर्शन करे , ताकि में और अच्छा लिख सकूँ , शब्द तो पत्थर में जान फूंक देते है , काश कभी सफल हो पाऊं

Santosh Kumar के द्वारा
May 13, 2012

चन्दन जी ,.नमस्कार बढ़िया रचना ,..आनंद भाई से सहमत हूँ ..सादर

    चन्दन राय के द्वारा
    May 13, 2012

    Santosh मित्र आप के बहुमूल्य समय और शब्दों के लिए आपका आभार हम कंहा इस लायक , बस लिख देते है ,

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 13, 2012

वाह रे आशिक देखि तेरी आशिकी …………….किन्तु कविता के बाड़े में और भाव के बाड़े में ज्यादा क्या बोलूं जोरदार हैं ………..किन्तु बुरा ना मानना मुझे उतनी ज्यादा ज्ञान भी नहीं इन बातों का सही से क्रमानुसार सजे नहीं लग रहे ………….उलट पुलट लग रहा है सब कुछ यानी पढने में सुर नहीं मिल रहे ऐसा होता है की लिखने वाला कुछ और सुर में लिकता है और पढने वाला कुछ और …………हो सकता है यह वही बात हो

    चन्दन राय के द्वारा
    May 13, 2012

    मित्र आप के बहुमूल्य समय और शब्दों के लिए आपका आभार हम कंहा इस लायक , बस लिख देते है , और आप जैसे सज्जन जब कहते हैं की अच्छा लिखा तो मान लेते है अच्छा ही है , और नकार देते है तो जानते है की भयिया मुर्ख और सीखो

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 13, 2012

priya chandan ji, sasneh na to aapko aur na hi aapki kisi rachna ko koi kharij kar sakta hai. maan ko pranam. badhai.

    चन्दन राय के द्वारा
    May 13, 2012

    kUSHWAHA JI , ITS ALL YOUR LOVE & SUPPORT , WHICH KEEPS US STRONG , & ENCORAGE US TO KEEP GOING

RAHUL YADAV के द्वारा
May 13, 2012

चंन्दन भाई सादर दो पंक्तियों में अपनी बात कहना चाहता हूं……… आज फिर इक दीवाना दिखाई दिया है……. जल्दी रोको इसे नहीं तो एक कत्ल फिर हो जाएगा । धन्यवाद…..

    चन्दन राय के द्वारा
    May 13, 2012

    RAHUL MITR , yOUR WORDS SAYS IT ALL MY DEAR, i CAN NEVER RETURN YOUR PRECIOUS TIME & WORDS

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
May 13, 2012

चन्दन जी सादर- माँ को समर्पित पंक्तिओं को नमन करता हूँ. और उस आशिक के लिए बस इतना ही कहना……………. “भीगे हुए परों से उड़ता चला गया ! मोड़ों में मौत की भी मुड़ता चला गया !! कर न सका मैं पार मोहब्बत का समंदर, जज्वात की लहरों में सिमटता चला गया !” “अंकुर” मेरी ये एक पूरी ग़ज़ल है, जब मंच पर आशिकाना माहौल बनेगा तब पोस्ट करूँगा. (मित्र बुरा मत मानना , ग़ज़ल में काफिया और रदीफ़ का विशेष ध्यान रखा जाता है, तभी वो मुकम्मल ग़ज़ल बनती है)

    चन्दन राय के द्वारा
    May 13, 2012

    अरे मित्र तुकांतता के आधार पर ग़ज़लें दो प्रकार की होती है- * मुअद्दस ग़जलें- जिन ग़ज़ल के अशारों में रदीफ और काफिया दोनों का ध्यान रखा जाता है। * मुकफ़्फ़ा ग़ज़लें- जिन ग़ज़ल के असारों में केवल काफिया का ध्यान रखा जाता है। बाकी मित्र आप के बहुमूल्य समय और शब्दों के लिए आपका आभार हम कंहा इस लायक , बस लिख देते है , और आप जैसे सज्जन जब कहते हैं की अच्छा लिखा तो मान लेते है अच्छा ही है , और नकार देते है तो जानते है की भयिया मुर्ख और सीखो

rajkamal के द्वारा
May 13, 2012

कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ की आप क्या कहना चाहते है और किससे ? क्षमायाचना सहित

    चन्दन राय के द्वारा
    May 13, 2012

    राजकमल जी , ऊपर लिखी गजल इक आशिक की है , जो अपनी महबूबा से अपने जज्बात कह रहा है , और आज क्यूंकि mother’s day इसलिए निचे लिखी दो पंक्तियाँ माँ को समर्पित है


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