कलम...

{ "हम विलुप्त हो चुकी "आदमी" नाम की प्रजातियाँ हैं" / "हम कहाँ मुर्दा हुए हमें पता नहीं".....!!! }

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है दान यहाँ क्यूँ मुर्दों सा

Posted On: 8 Apr, 2012 Others में

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है दान यहाँ क्यूँ मुर्दों  सा,

ये मंदिर है मरघट नहीं !

रोज मरती है जिंदगियां सडको पर,

जाओ उन्हें पहले जिन्दा करो,

रह गया जो सींक सूख के कंकाल भर !

**********

है कपाट बंद क्यूँ कब्रिस्तान सा,

ये देवालय है कोई खंडर नहीं !

आबरू बेघर, कुचली नींद फुटपाथ पर,

रैन बसेरा सा, ला लावारिसो की छतनार करो,

सोते है जो मेमेनें भेड़ियों संग, रख  के  प्राण हथेली पर !

**********

है पीली गिन्नियों, हरी गड्डियों में क्यूँ ध्यान इतना,

वो ब्रह्म है, बनिया या साहूकार नहीं !

गाँव बंजर सारे, अक्क्षरता संसार भर,

ढींड भर भर पहले उनको विद्वान् करो,

जिनकी मौत गिरवी,बदनसीबी की दुकान पर !

*********

सजाओ शौक से मंदिर, चाहे मारो पोछा प्रांगन भर

धो धो प्रभुचरण पियो, चाहे मांजो श्रद्धा से जी-जी भर जूठन

पर बंद करो सीधे हाथ से उल्टा कान पकड़ना,

मंदिर में भजन, जग जीभ से छूरी घोंपना ,

जाओ अभागो संग पहले अपना भाग जोड़ो,

सीखो दो कर-पदों को लाखों करोड़ों करना !

***********

मित्रो ये कविता भर नहीं है , आहवाहन है की आओ बदले इस पाखण्ड को !

चन्दन राय

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