कलम...

{ "हम विलुप्त हो चुकी "आदमी" नाम की प्रजातियाँ हैं" / "हम कहाँ मुर्दा हुए हमें पता नहीं".....!!! }

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बस नेता ही है मेहफूज

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हमारी थालिओं की भूख गायब गायब है जिस्म से खून
मेहफूज है मजबूरियां जिस्म मे बस हड्डियाँ ही हैं मेहफूज

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हमारी रसोई से आटा दाल सब्जी गायब गायब मीठा और सुकून
मेहफूज है खाली डिब्बों मे कंकड़, पेट मे बस पत्थरी ही हैं मेहफूज

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हमारे सर की छते गायब गायब अपनी पुश्तैनी जमीन
मेहफूज है नींद फुटपाथ पर बदन पर फटा कुर्ता पजामा ही हैं मेहफूज

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हमारी अर्जियां फाईलों से गायब गायब दफ्तर से बाबुजी और मुनीम
मेहफूज है नए आवेदन करना अभी और नए दफ्तर के चक्कर है मेहफूज

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हमारे देश की उन्नति गायब गायब हो रहा गरीब आंम आदमी
मेहफूज है बस पार्टियाँ अब इस गुलिस्तान मे बस नेता ही है मेहफूज

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dineshaastik के द्वारा
March 3, 2012

चंदन जी नमस्कार, कमाल का शब्दों का सटीक चित्र खींचा है आपने….बधाई….

    chandanrai के द्वारा
    March 4, 2012

    यह तो आपके देखने मै सोदर्या है अन्यथा मै दास इस काबिल नहीं मेरी आत्महत्या कविता का आनंद ले

akraktale के द्वारा
March 3, 2012

चंदनजी, हमारे देश की उन्नति गायब गायब हो रहा गरीब आंम आदमी मेहफूज है बस पार्टियाँ अब इस गुलिस्तान मे बस नेता ही है मेहफूज यूँही गायब होने का सिलसिला चलता रहा तो फिर ये नेता भी महफूज नहीं रह पायेंगे. सुन्दर रचना. बधाई.

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 2, 2012

चन्दन जी मनस्कर……. कहाँ से पाते हैं इतना ज्ञान.सुन्दर….


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