कलम...

{ "हम विलुप्त हो चुकी "आदमी" नाम की प्रजातियाँ हैं" / "हम कहाँ मुर्दा हुए हमें पता नहीं".....!!! }

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महाभूत


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“माटी के लाल” (आदिवासी कविता)

Posted On: 17 Sep, 2012  
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“जय जय ‘कांग्रेस’ तेरी जय जय हो” !

Posted On: 31 Aug, 2012  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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“खाप के बाप”

Posted On: 20 Jul, 2012  
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“दर्द की पैदावार”

Posted On: 9 Jul, 2012  
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“बिजली भाग गई” ?

Posted On: 19 Jun, 2012  
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“लावारिश लाश”

Posted On: 10 Jun, 2012  
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“मेरा अंतर्विरोध”

Posted On: 4 Jun, 2012  
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“सिरफिरे गड्ढे”

Posted On: 1 Jun, 2012  
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“कायर आत्महत्या ”!

Posted On: 27 May, 2012  
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“खुदा की कमाई प्रिय तुम्हारा चेहरा”

Posted On: 18 May, 2012  
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“शायद तुम्हे प्यार है”

Posted On: 15 May, 2012  
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“ख़ारिज कीजिए शौक से मेरी मुहब्बत”

Posted On: 13 May, 2012  
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“माँ मेरी प्यारी माँ”

Posted On: 6 May, 2012  
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“बस नेता ही है मेहफूज”

Posted On: 2 May, 2012  
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“परमपूज्य पिता जी”

Posted On: 22 Apr, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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चन्दनभाई नमस्कार मैं सो कोल्ड आदीवासी गांवों में ३० दिन ( तीन साल १०-१० दिन, युनिवर्सिटी की तरफ से, गोधरा और वडोदरा के बीच का एरिया में ) सेवा काम के लीए गया था । चौचालय के खड्डे खोदने का काम हम करते थे । छोटे और युवा आदमी हमारी तरह ही थे, पूरे कपडे में । बुढे लंगोटी वाले थे । बुढों के जाने के बाद आज वो सब हमारे जैसे हो गये होंगे । गांव में झोंपडे से ले के पक्के मकान थे । हमारी कोइ जिज्ञासा नही थी उस समय पर लेकिन हमारे सर ने एक आदमी को पकड कर पूछ ही लिया । " भाई हमारे कोलेज के बच्चे ईधर आ के कोई खास काम तो करते नही, छोटासा काम है आप लोग भी ये कर सकते हो ।" वो आदमी समजदार था कहा " छोडो साहब, हमारी प्रजा काम करने से ही डरती है, एक ही काम करती है, महुडे के फुल तोडती हे, उस से दारु निकाल के पी लेते हैं । खेतीवाडी भी भगवान के भरोसे । वो जो देता है काम निकल जाता है । हिम्मत ही नही है । हिम्मत कर के जो लडके सुरत या साउदी गये उन के घर पक्के हो गये । " पैसा आने पर ही फरक पडता है । और पैसे के लिए काम का जजबा और हिम्मत दोनो चाहिए ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

भदौरिया जी , मुझे कभी किसी की निजी आलोचनाओं का आत्मिक ठेस नहीं पहुचता ! मे आपको बताना चाहता हूँ शहरी गरीब और एक आदिवासी जनजीवन में जमीन आसमान का अंतर है , भूमी ललक के लिए प्रकृति का यूँ शोषण किसी भी तरह से हमारे लिए फलदायी नहीं है ,जंगल का काटना,पहाड़ों का स्खलन ही प्राकृतिक असंतुलन और आपदाओं का सबसे बड़ा कारक है ! आप ही बताएं कितने शहर जंगलों में बने है ! मेरी यह कविता गरीब आदमी पर नहीं बल्कि आदिवासी समाज पर केन्द्रित है ! गरीबी एक अलग पहलु है जिसकी आदिवासी समाज ज्यादा परवाह भी नहीं करते ,उन्हें तो अपनी लुटती बस्तियों से मतलब है ! मैंने यंहा शहरी जनजीवन में रहने वाले लोगो को आदिवासी नहीं कहा, कृपा आदिवासी समाज की दयनीय स्थिति ,उनके संघर्ष , के विषय में गहरा अध्ययन करें ! यदि आप उनके दुखों से परिचित होते तो आप ऐसे विरोधाभास भरी बाते नहीं करते ! आप यदि पुरे आदिवासी समाज को नक्सलवाद कहेंगे तो ये आपका बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण प्रयास है ! क्या आज के इंसान बलात्कारी नहीं ,हत्यारे नहीं ,आतंकवादी नहीं ,तो क्या आप पूरी इंसानियत को दोगला कह देंगे ! रही बात नक्सलवाद की तो आप से अनुरोध है की उसकी तह में जाइए ! आशा रखता हूँ अगले वैचारिक बहस से पहले आप आदिवासी संघर्स से परिचित होंगे !

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

भदौरिया जी , आपने कविता की वो पंक्ति ध्यान से नहीं पढ़ी जिसमे लिखा है आदि सभ्यता के अंतिम अवशेष , वो वनवासी उनकी पीढियां जंगलों में ही छुट गई या जिन्होंने आधुनिकता से दूर जंगलों में ही रहना पसंद किया ! उनकी पीढियां दर पीढियां जंगलों में जीवन यापन करती चली आ रही है ,और आज भी वन्ही रह रही है ! वो आपके समाज में पैदा होने वाले लोग नहीं हैं ! वो आपके प्रदूषित मानवता से दूर अपने शांत वातावरण में जी रहे हैं ! आदि वासी का अर्थ है सबसे पहले वासी , आदिवासी एक पवित्र शब्द है इसका यूँ सस्ता इस्तेमाल ना करें ! आप जिन की बात कर रहे है वो निसाचर है आज उनके जंगल ,पहाड़ ,नदियों और उनकी सभ्यता को आधुनिकता के राक्षस खा जाना चाहते हैं , आओ उनके लिए आवाज उठायें यही मेरा प्रयास है !

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

चन्दनभाई नमस्कार गरीबों की पिडा आपने अच्ची तरह बताई है । ये जनरल बात है अपने पर मत लेना । कुछ सवाल है, आदीवासी का मतलब क्या है ? दो चार हजार साल पहले के आदमी को आदीवासी कह दे तो ठीक है, लेकिन हमारे युग में, हमारे साथ जन्मे, हमारी उमर के लोग आदीवासी कैसे हो गये ? गरीबी के कारण ? रहने के स्थल के कारण ? लाईफ स्टाईल के कारण ? अपनी लाईफ स्टाईल अच्छी दूसरों की बूरी ये ये जजमेंट लेना ठीक है ? या कोइटेकनिकल कारण है जीस से आदीवासी एक जाति बना दो तो बडा वोट बेंक बन जाए ? या उंचे लेग उंची पसंद का मामला है ? आज देश विदेश के फोटो वाले, ये गरीब एक मनरंजन की चीज हो ऐसे फोटो लेते हैं फीर उंचे लोग को दिखाते हैं, उचे लोग का ये धंधा सही है ? कोइ गरीब आदमी ईन उंचे लोग की क्लब में घुस कर फोटो लेगा और अपने लोगो को बतायेगा " देखो, हमतो देसी पी के खूश है, कुदरत की खुली हवामें नाचते हैं, ये उंचे लोग विदेसी पी के नाचते नाचते है, कैसे अपनी बीवियों की अदला बदली कर लेते हैं ? हम आदीवासी है या वो ?

के द्वारा: bharodiya bharodiya

एक दुसरे कार्टून में जिसकी चर्चा आम जनस्तर से बड़े राजनैतिक गलियारों में शोर मचा रही है ,जिसमे कसब संसद पर पेशाब कर रहा है ! आप संसद को ही ले लिजिय जिस तरह वहा सांसदिक आचरण का नंगा नाच होता है ,क्या वह संसद पर पेशाब करने सा नहीं है ,अब आप ही बताएं वह शख्स जिसने जलियावाले बाग़ की तरह अंधाधुंध गोलिया चला बर्बरता दिखाई, फिर हमारे ही कानून प्रणाली का प्रयोग कर हमारे घावों पर नमक छिड़कने का उसका दुस्साहस , क्या हमारे संसद का अपमान नहीं है ? चन्दन राय जी , सच कहूँ तो आज आपकी प्रतिभा के असली रूप को देखा है ! आपने नए नए तथ्य ( कार्टून ) देकर अपनी रचना को बहुत ही पठनीय , रोचक और सार्थक बना दिया है ! बहुत ही गंभीर विषय पर आपका लेखन , मन में सवाल उठता है और उनका जवाब भी मिल जाता है आपके लेखन में ! बहुत सुन्दर ! मेरी बधाई स्वीकार करें और हाँ ! आप भी ध्यान रखें , ऐसे शब्द आपको भी दूसरा असीम त्रिवेदी न बना दें ?

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

इस नैतिकता के चलते ही हिन्दू 1500 साल से गुलाम हैं और जब तक दिन को दिन कहने का साहस न होगा  गुलाम ही रहेंगे  आदर्श पुरूष वह होता है जिसका स्वाभिमान हो जो समाज को आत्मविसवास दे गुलामी सिखाने वाले आदमी आदर्श नही करते जैसे सुभाष  सरदारपटेल  लालबहादुर, शिवाजी  चाणक्य  आदि गान्धी नेहरू इन्दिरा राजीव न तो आदर्श थे और न ही अनुकरणीय घर  की छत पर अकेला बैठ मेरी बात को एक घंटा ध्यान से सोचना मै फिर दोहराता हूं कि उद्देश्य सही पर  आदर्श गलत है लम्बी गुलामी ने शायद सोचन की ताकत कुंठाग्रस्त कर दी है मै तो एक बूढा आदमी  हूं  और 70 सालो से ये नैतिकता,वसुधैव कुटुम्बकम, अहिंसा का नाटक देख रहा हूं जो सिर्फ हिन्दुओ के लिए है

के द्वारा: snsharmaji snsharmaji

शर्मा जी , क्या आप किसी भी इतिहास की मुद्रित पांडुलिपि को इतिहास के सभी बिन्दुओं पहलुओं का एकदम शत प्रतिशत प्रारूपीकरण कर सकते है ! हर लेखक की मानसिकता का किसी भी घटनाकर्म का विवरण पर गहरा प्रभाव होता है ! एक लेखक का मानवीय धर्म उसे स्त्यायता के पास लाता है और बनावट के पास ले जाता है ! यदि आप पाकिस्तान के मुद्रित इतिहास को पढेंगे तो आपको भारतीय योगदान से अधिक मुस्लिम क्रांतिवीरों के योगदान का विवरण मिले ! बटवारे के लिए हिन्दुओं को जिम्मेदार बताया गया हो ! हमारे देश में और विदेशों में भी अनेक लेखकों ने आपकी गांधी विरोधी विचारधारा का खंडन किया है ! आप उनकी संख्या भी ना गिन पायें ! आपकी इस बात से मे सहमत हूँ की मुझमे ज्ञान की कमी है ! पर मेरे अनदार नैतिकता की कोई कमी नहीं ! मे किसी भी लेख को एक पक्ष देख कर नहीं लिखता ! यह लेख गाँधी पर समीक्षा नहीं ! उसके आदर्शों का नियातिकरण है कृपा मेरे मतभेद को मनभेद न समझे ! मेरे लिए आपके बहुमूल्य विचार बेहद महत्वपूर्ण है ! और आपके प्रति मन में उतना ही अमूल्य सम्मान भी है !

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

शर्मा जी , आप गांधी को गाली देकर जाने क्या साबित करना चाहते है पता नहीं ! मे इतिहास की बात नहीं करूंगा क्योंकि कोई भी उस इतिहास में नहीं था जिसका आपने वर्णन किया है , मे आपकी कही संकुचित निंदनीय बात पर कोई टिपण्णी भी नहीं करूँगा ! पर जिस विभाजन की बात आप कर रहे है और आपके कहे अनुसार गाँधी ने उसका विरोध किया था ! आप विभाजन को तर्कसंगत बता रहें है तो देखीय आप विभाजन का दंश वर्तमान में भुगत रहें है है ! समय समय पर हिंद पाक युद्ध ,आतंकवादी घटनाओं में निर्दोष नागरिकों का मारा जाना , इसी विभाजन का दूरगामी नतीजा है ,जिसे गांधी जी ने जान लिया था ! मे किसी व्यक्ति विशेष की पिछलग्गू नहीं करता ,मेने तो उन आदर्शों की बात की है ,जिसके जनक गांधी थे ,और इन सिधान्तों को समय, इतिहास ने प्रमाणित किया है ! हमें यही सिद्धांत वसीहत में मिले थे , जिसका अनुपालन हम नहीं कर पा रहे ! उपरोक्त लेख मे मुल्त देशप्रेम और दायित्व के गिरते स्तर पर व्याख्यान है ! यदि आप इन भावनाओं से ज्यादा अपने अहम् के उत्तरदायी है तो __ _ _यह हमारे देश का दुर्भाग्य है

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

 चन्दन भाई आपकी बात सही नही  कांग्रेस पूर्णत गान्धी पर चल रही है जैसा दोगला नमकहराम लुचा  गान्धीथा वैसी काग्रेस है उसको देस से कुछ नही लेना था   पराईऔरतो संग नंगा सोता था उनके नाम आभा, मनी,सरला सुशीला व मैडलीन सलैड थे इतिहस गहराइ से पढो ।  श्रध्दाननद का हत्यारा क्या लगता था राजगुरू  सुखदेव  भगत सिंह के लिए   कलम नही थी मालाबार मे 20000 हिन्दू मार दिए  हिन्दू औरतो की ईजत लूटी गर्भवतीयो के पेट मे चाकू मार दिए गान्धी कुछ नही बोला  अम्बेदकर ने भी निन्दा की जिन्हा ने अलग देस दिलाया इसने हिन्दू दोयम दरजे के नागरिक बना दिये   बटवारा मेरी  लाश पर होगा कहकर पांच लाख हिन्दू मरवा दिए वरना  तुरर्की आदि देशो की तरह असानी से बटवाराहो जाता         माफ करना  आपका उद्देश्य सही है पर गान्धी को आदर्श बताना गलत शान्ती का नोबल पुरस्कार लेने के लिए  मुसलमानो मे  भी सर्वमान्य नेता बनने केलिए हिन्दू मरवाए पर मुसलमानो ने इसे कभी नेता नही माना  मौलाना जौहरअली ने तो इसे एक तुछ मुसलमान से भी नीच कहा है सन्दर्भ ग्रंथ वासदेव त्रिपाठी का लेख गान्धी राष्ट्र पिता या पुत्र ,मालाबार का हिन्दू कत्ल, खुशवन्त का भास्कर मे लेख गान्धी की आत्मकथा  महात्माहंसराज कीआत्मकथा

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चन्दन जी, ओजपूर्ण और विचारोत्चक लेख के लिए बधाई. आपने वास्तविक चित्रण किया है ,यही बात सरदार भगत सिंह कहते थे कि गोरे अंग्रेजो से आजादी मिलने के बाद इनसे कही बड़ी लड़ाई काले अंग्रेजो से मुक्ति के लिए लड़नी होगी. आज वही स्थितिया उपस्थित हो गयी है अब इन भ्रष्टाचारियो के खिलाफ अभियान की शुरुआत हो चुकी है, आज तक कोई आन्दोलन मीडिया के माध्यम से प्रारंभ नहीं हुआ हाँ यह जरुर है कि मुनाफा वसूली के लिए किसी स्तर तक जा सकता है यह नाडिया टेप कांड ने मिडिया को बेनकाब क्र दिया है आपका यह निष्कर्ष बिलकुल सही है कि यहाँ का मीडिया पूरी तरह बिकाऊ मॉल है जिसे खबरों की तलाश उसी प्रकार रहती है जैसे शेर का अपने शिकार कॉ 

के द्वारा:

के द्वारा: Sumit Sumit

वासुदेव मित्र , मिडिया जँहा तक मे समझता हूँ एक आलोचनात्मक व्यवस्था नहीं ,बल्कि किसी भी देश की राजनैतिक ,सामाजिक,आर्थिक , नीतियों तथा व्यवस्था के आचरण पर नैतिक आधार पर एक नीतिगत खुली समीक्षा करना है ! जिसका मूल उद्देश्य देश की अखंडता ,प्रबुध्त्ता ,उन्नति में बढ़ावा देना है ! मेरा यह लेख भी मिडिया पर हमला नहीं उसके आचरण ,जिम्मेदारी की समीक्षा है ! किसी भी खोह या महीतल तक जाने से पहले वास्तविक धरातल के सभी पहलुओं ,बिन्दुओं ,कारको को जाचना परखना आवश्यक है ! हाल फिलहाल मे भारतीय राजनीती के सबसे दुर्जन व्यवस्था और उसके ठेकेदार जिम्मेदार तथाकथित राजनेताओं पर कंही कोई खास समीक्षा नहीं हुई ,आलोहना तो दूर की बात है ! देश में हुए दंगो पर समीक्षा तो हुई ,ब्यान आये ,पर बीते १० वर्षों से दंगो के पुन्रावन और नाकाम निजाम शाशकों की समीक्षा का शोर भर सायद किसी भारतीय ने सुना हो ! मीडिया एक संतुलित समीक्षा का प्रतिचिहं है ,उसकी निर्णायक एकतरफा आलोचना देश के असुंतलन का सबसे बड़ा कारक होता है ! २६/११ की आतंकी दुर्घटना और हाल में ही मीडिया द्वारा दखाया जा रहा दंगा उत्पीडन कंही न कंही अराजकता ,अशांति और दंगे उत्प्रेरक के रूप में काम करता है ! फिर भी मे इस लेख को आलोचनात्मक ना मानते हुए एक तीखी समीक्षा मानूंगा ! यह प्रत्युतर है ,अपनी बात या लेख का बचाव नहीं ! यदि आप सहमत ना हो , तो मे आपसे मीडिया की भूमिका का आधार या पत्रकारिता धरम का अभिप्राय जानना चाहूंगा ! आप एक प्रकांड बुद्धिजीवी है मे आशान्वित हूँ आप इसे सकारत्मक चर्चा के रूप में लेंगे !

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

चन्दन जी, राष्ट्रचिंता से परिपूर्ण एक भावोत्तेजक लेख प्रशंसा के योग्य है| आज लबादों को ही उतार फेंकने और सच को स्वीकारने और सच की ओर बढ़ने की आवश्यकता है| आपके सभी विचारों से सहमत हूँ किन्तु आप ने जो मीडिया पर जो आरोप लगाया कि "मीडिया पवित्र आन्दोलनों में भी बारीक से बारीक त्रुटियों को अंडरलाइन करने के घमंडी और नासमझ, नादान ,गवार प्रयास को अपने नैतिकता की प्रमाणिकता और जिम्मेदार स्तम्भ के रूप में प्रस्तुत करती है" से मैं पूर्णतः सहमत नहीं हूँ| मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ तभी है जब वह महीन से महीन बात को सामने निकालकर रखे.! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी इसी लिए है कि आप अपना विचार रख सकें! फिर वह चाहे अन्ना का आन्दोलन हो अथवा रामदेव का.! आलोचना तब और केवल तब की जानी चाहिए यदि मीडिया सच को तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत कर रहा हो अथवा दुराग्रह से पीड़ित हो.! यद्यपि ऐसा है भी... प्रत्येक मीडिया घटक निष्पक्ष नहीं है तथापि आप यह नहीं कह सकते कि कोई आन्दोलन आपको पवित्र, सकारात्मक लगता है तो उसकी आलोचना ही नहीं होनी चाहिए.! यह भावनात्मक रूप से तो सही लगता है किन्तु भावना धोखा न खाए जाये अथवा त्रुटी न कर दे इसके लिए आलोचकों का होना भी आवश्यक है.! मीडिया की किताब में पहला पाठ यही है कि वे वो देखें जो आप नहीं देख सकते| मात्र दुराग्रह घातक है आलोचना नहीं.!

के द्वारा:

आदरणीय चन्दन जी, सादर ! आज की मानसिकता का सटीक वर्णन ! क्या हम केवल बातों के वीर रह गए हैं ! वास्तव में कोई कुछ करना क्यों नहीं चाहता ? ""सबसे बड़ी हास्यापद स्थिति यह की हम कुछ ज़िंदा देशभक्तों के आंदोलनों और आचरण का सूक्षम पोस्टमार्टम कर रहे है, जबकि हमें निठल्ले,कामचोर, घोटालेबाज , महंगाई और भ्रष्टाचार के दामाद नेताओं का सघन काला कारनामा नजर ही नहीं आता !"" ""लोकतंत्र के आधार को बचाने वाली मीडिया भी इसी अंधकूप में भटकी हुई है ! उसकी सुक्षमदर्शी समीक्षा आंदोलनों की बारीक से बारीक त्रुटियों को अंडरलाइन करने के घमंडी और नासमझ, नादान ,गवार प्रयास को अपने नैतिकता की प्रमाणिकता और जिम्मेदार स्तम्भ के रूप में प्रस्तुत करती है ! यह कैसा राष्ट्रनिर्माण और जिम्मेदारी का निर्वाहन है !"" बहुत सारगर्भित रचना ! जो अनेकों प्रश्न करती है ?

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

चन्दन जी ,.सादर नमस्कार दिनेश जी के कथन से सहमती है ,.हमारी चमड़ी को कोई दर्द भेदता ही नहीं ,दिल बहरा बंजर ,और आँखे पाषाण असंवेदनहीनता की शिकार है !......................गांधी का उत्तराधिकारी होने लायक कोई नही है ,....हमें इसकी जरूरत भी नहीं है ,.गांधीजी और अन्य महापुरुषों से सीखकर आज के माहौल के अनुसार काम करना है ,...लेकिन यहाँ उत्तराधिकार का ही राज है ,.. "..साल भर से ज्यादा समय से चलने वाले एक आन्दोलन ,जिसने लगभग प्राथनाओं,अनशन,विभिन्न व्यवस्थाओं,प्रारूपों के विभिन्न चरणों को बड़ी शालीनता और सूझ-बुझ से निभाया हो , उसकी ईमानदारी और आंतरिक मंशा पर कोई भी प्रशन उठाना खुद के देशद्रोही होने का सबूत है !""" आपने बड़ी सहजता से सबको देशद्रोही बना दिया ,....यहाँ प्रश्न उठाने वाले आन्दोलन की लम्बाई नहीं बल्कि उसकी गहराई और परिणाम चाहते हैं ,...नब्बे साल लड़ने का माद्दा हम नामर्दों में अब नहीं है ,..एकला चलो का गान कोई भी गायेगा उसे प्रश्नों का सामना करना होगा !...नया राजनीतिक नेतृत्व देश की जरूरत है लेकिन इसका निर्णय सभी पक्षों को मिलकर करना होगा ,..डॉ.लोहिया जैसे महान समाजवादी द्वारा बनायी पार्टी जनता पार्टी अभी तक जिन्दा है,..उसको जिन्दा रखने वाले डॉ.सुब्रमनियम स्वामी जैसा देशभक्त जुझारू नेता राष्ट्र की उम्मीद है ,..भ्रष्टाचार के उद्गम स्थल को बंद करने के लिए उनके साहस समर्पण को देश प्रणाम करता है हमें सभी विकल्पों पर विचार कर सर्वश्रेष्ठ विकल्प पर एकजुट काम करना होगा ,.. अभी रामलीला मैदान पर देश की नजर है ,...हम भी वहीँ जा रहे हैं ,...आपका और सभी भारतपुत्रों की वहां प्रतीक्षा है ,..सादर आभार सहित

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

प्रिय खुशबूदार चन्दन जी .....सप्रेम नमस्कारम ! पंजाबी में एक कहावत है की “अपना निंगर और पराया ढींगर” यानी की अपनी सस्ती और बेकार वस्तु को भी बढ़ा चढ़ा कर कीमती बतलाना तथा दूसरे की बेशकीमती वस्तु को भी बेकार और बेमतलब की बताना ..... अमेरिका का चरित्र कुछ इस तरह का ही रहा है हमेशा से ही ..... जब ओबामा ओसामा का क्रेडिट लेने की होड़ में आगे है तोफिर पाकिस्तानियो को क्या कहा जाए क्योंकि उन “बेचारों” को तो सरकार और आंतकवादियो तथा धार्मिक और कट्टर जनता और मुल्लाओं सभी का तुष्टिकरण करने के लिए भारत के खिलाफ खुद को कुछ करने लायक साबित करना पड़ता है :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) जय श्री कृष्ण जी

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

आदरणीय चन्दन जी नमस्कार, क्षमा करना आपके आलेख को मै कांग्रेस की नीतियों के सामान ही मानता हूँ क्यों की वे भी कुछ इसी प्रकार के बयान देते हैं. अपनी गलती मानने की बजाय वे दूसरों की गलतियों पर ऊँगली उठाने का कार्य करते हैं. अमरीकी अर्थवयवस्था बहुत बड़ी है रेटिंग में थोड़ी कमी से भी वे हिन्दुस्तान की अपेक्षा बहुत अच्छी स्थिति में हैं. मगर टाइम्स में जबसे मनमोहन जी को कमजोर बताया है तब से लोग अपनी गिरेबान छोड़कर अमेरिकी गिरेबान में झाँकने लगे हैं. दरअसल इस अखबार की बात को बिल्ली के रास्ता काटने की तरह लिया जाना चाहिए. किन्तु कई लोग इसे भी अपशकुन के नाम पर बिल्ली को ही कोसने लग जाते हैं. जबकि वह तो आपके साथ होने वाली बुरी घटनाओं की चेतावनी या संकेत देती है. बस यह अखबार भी संकेत कर रहा है तो उस संकेत को समझने की जरूरत है. हम दूसरों पर ऊँगली उठाकर कुछ हासिल नहीं करने वाले जबकि अपने सुधारों से मंजिल पा सकते हैं.

के द्वारा: akraktale akraktale

चन्दन जी. हैरानी की बात यह की लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अंतर्गत मिली आजादी का खाप पंचायेतें नाजायज फायेदा उठाना चाहती है.दूसरी बात यह है हमारे ग्रामीण समाज से जुड़े लोग समाज को कौन सी सदी में ले जाना चाहते हैं .यह तो सत्य है जिस देश में पाबंदियां अधिक थोपी गयी वह देश उन्नति नहीं कर सका .उदहारण हमारे सामने है एक तरफ अफगानिस्तान है जो तालिबानियों से त्रस्त है,पाकिस्तान बंगलादेश जैसे अनेक मुल्क पिछड़े हुए हैं तो दूसरी तरफ उदारवादी दृष्टिकोण के कारण संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश विश्व पटल पर अपना परचम लहरा रहे हैं. पश्चिमी देश विकसित देशों की पंक्ति में सबसे पहले खड़े हुए,कारण वैचारिक आजादी.

के द्वारा:

चन्दन भाई, ये वही खाप पंचायते हैं जो कभी बलात्कार करने वाले पुरुष को 10 जूते मारने का फरमान सुनाती है, कभी पांच-दस हजार रूपये की आर्थिक सजा सुनाकर उसके कुकर्मो की भरपाई करवाने का ढोंग रचती हैं, इन खाप पंचायतों की नज़रों में स्त्री की इज्ज़त की क्या कीमत है आप खुद ही अंदाजा लगाइए....हाँ इन्हें इसमें स्त्री की ही गलती देखनी है क्या करें खुद भी तो उसी पुरुष मानसिकता से ग्रस्त हैं, किसी दिन खुद भी किसी का बलात्कार करते हुए पकडे गए तो पांच-दस हज़ार रूपये देकर बात रफा-दफा करवा लेंगे.... जब इनकी अपनी बेटी की साथ कभी बलात्कार होगा तब शायद इन्हें एहसास हो की बेटी की इज्ज़त क्या होती है....या ये भी हो सकता है की तब ये उस लड़के और अपनी लड़की दोनों को मौत के घात उतार कर अपनी इज्ज़त पर लगा दाग धोने की कोशिश करें.....बहुत शर्म और बहुत गुस्सा आता है ऐसे इज्ज़त के ठेकेदार खाप पंचों पर

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

चन्दन जी नमस्कार, आपने बिलकुल सही कहा है कि खाप पंचायतें महिलाओं पर तो लगातार प्रतिबन्ध लगाती जा रही है किन्तु उन मर्दों के लिए कोई नियम जारी नहीं कर रही है जो इनके साथ दुराचार कर रहे हैं. यह पंचायत का एक तरफा निर्णय है. दरअसल आज खाप पंचायत में बैठे पंचों में निष्पक्ष कम और रसूख वाले लोग ज्यादा बैठे हैं. कोई पंचायत में बैठे इन ताउओं को हकीकत का सकारात्मक पहलू बताने को तैयार ही नहीं है. इनके यह मुस्लिमो के फतवे कि तरह जारी निर्णय महिलाओं में खौफ लाने और समाज के पुरुषप्रधान होने कि याद दिलाने के निर्णय अधिक लगते हैं इनसे कुछ भला होगा ऐसा लगता तो नहीं है. और सरकार को बार बार बुरा कहना भी अब लगता है कि हम वही घिसा पिटा रिकार्ड बजा रहे हैं. यदि सरकार जागरूक हो तो कोई खाप पंचायत या कोई मुस्लिम संगठन किस तरह इस तरह के अनैतिक फैसलों पर मुहर लगा सकते हैं. सच्चाई पूर्ण आलेख पर साधुवाद.

के द्वारा: akraktale akraktale

chandan jee, सादर! खाप पंचायत या किसी भी माँ-बाप की जिम्मेदारी प्रतिबंधित नियमो के अनुसरण से पूरी नहीं हो जाती ! अपितु पुत्र हो या पुत्री उसमे सामाजिक और नैतिक मूल्यों के निर्माण की अनवरत कोशिश के उदार संकल्प से ही हम अपेक्षित बदलाव की नीव रख पायेंगे ! और एक बात पंच को परमेश्वर का दर्जा होता है , अत: मेरा खाप के परमेश्वर पंचों से विनम्र अनुरोध है की सबक सिखलाये उनको , जो आपकी बेटी की अस्मिता पर प्रहार करे ,पर उनके डर से अपनी बेटियों पर बंधन ना बांधे .क्योंकि मै जानता हूँ आप हमारा ऐतिहासिक गौरव है ,पर कमजोर नहीं ! बस आप मानवीय मूल्यों के सैद्धांतिक भटकाव पथ पर अग्रसर है ! उत्तम अभिब्यक्ति! बधाई!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

खापीय व्यवस्था स्त्री की भूमिका को कमजोर करती है ,उसे ताकतवर नहीं बनाती ! अत: खुद को मजबूत और शक्तिशाली कहने वाली इस संस्था को बेटियों की सुरक्षा में अपने भरोसे का आत्मबल देना चाहिय , उन आततायी दानवो को अपनी व्यवस्था से निकाल फेकने की जरुरत है जो इन मापदड़ों की आड़ में स्त्री के साथ अपनी मनमानी करते है ! वैसे भी तो पंच को परमेश्वर का दर्जा होता है , अत: मेरा खाप के परमेश्वर पंचों से विनम्र अनुरोध है की सबक सिखलाये उनको , जो आपकी बेटी की अस्मिता पर प्रहार करे ,पर उनके डर से अपनी बेटियों पर बंधन ना बांधे .क्योंकि मै जानता हूँ आप हमारा ऐतिहासिक गौरव है ,पर कमजोर नहीं ! सहमत, आदरणीय चन्दन जी, सादर

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

चन्दन जी नमस्कार, आपने भोपास त्रासदी से सम्बंधित कई रोचक जानकारियाँ दी है. निश्चित रूप से वारेन एंडरसन को भगाना एक षड्यंत्र था क्या उन षडयंत्र करने वालों को इस देश में सजा मिली? क्या एंडरसन को म्रत्युदंड भी दे दिया जाए तो उन पीड़ितों का कुछ भला होगा? दोनों ही के उत्तर है नहीं.इसलिए मेरा मानना है की सरकार खुद पहल करे और उन व्यवस्थाओं पर ध्यान दे जो इन पीड़ितों के लिए की गयी है जो अस्पताल इनके लिए बने है उसपर पैनी नजर रखे, पीड़ित की अक्षमता पर उसके भरणपोषण की व्यवस्था करे. क्योंकि इस घटना के बाद के पहलुओं को भी मैंने देखा है लोगों ने तुरंत अपने दूर रहने वाले रिश्तेदारों के नाम भी पीड़ितों की लिस्ट में शामिल करा दिए है इसकारण यह संख्या हकीकत से कहीं बड़ी नजर आने लगी है. कई व्यक्ति सक्षम थे उन्होंने खुद के खर्च पर अपना इलाज कराया. कई नौकरी पेशा लोग थे जो अब भोपाल में नहीं रहते. और अब इस घटना का भी राजनीतिकरण हो गया है.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: jagojagobharat jagojagobharat

चन्दन भाई, नमस्कार बहुत ही सटीक प्रश्न आपने उठाया है ...........हमारे देश का दुर्भाग्य ही यही है की इन्साफ को भले शर्म आ जाए किन्तु हमें शर्म नहीं आएगी कभी ...................राजनीति में धुला हुआ यह चेहरा बहुत काला है.....इस विषय पर इसी मंच के आदरणीय डा मनोज रस्तोगी जी की एक छोटी सी कविता आपको पढ़ाना चाहूँगा सुन रहे यह गैस आदमखोर है । हर तरफ बस चीख, दहशत शोर है ।। बढ रहे हैं जिस सदी की ओर हम । यह उसी की चमचमाती भोर है ।। मौत से क्‍यों इस तरह घबरा रहे । जिंदगी तो एक रेशम डोर है ।। इस तरह मातम मनाते क्‍यों भला । देश तो अपना प्रगति की ओर है ।। मत कहो यह गैस जहरीली बहुत । आदमी ही आजकल कमजोर है ।। डा. मनोज रस्‍तोगी मुरादाबाद

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

के द्वारा: jalaluddinkhan jalaluddinkhan

चंदन जी, सामाजिक कुरीतियों जैसे जिस्मफ़रोशी, भूण हत्या, बाल रोजगार को आपने एक ही रचना में समेट कर एक आम आदमी के अन्दर दबे आक्रोश का सही चित्रण किया है. बस शिकायत यही है कि कुछ व्याकरण की त्रुटियां रह गई और कुछ बिम्ब विरोधाभासी हो गये... जो और बेहतर हो सकते थे. जैसे "दर्द के बगीचे कुकिस्मों के" "शिखंडी रोंगटे से तमाचा मार" मैं समझ नहीं पाया..शायद व्याकरणिक रूप से सही न होने के कारण. आप बेहतर जानते हैं. "वंहा कब्रों में बगावत का चन्दन उगता है" बगावत... नाकात्मक शब्द है जबकि चन्दन एक साकारत्मक अभिव्यक्ति.... मुझे विरोधा भास प्रतीत हुआ... बगावत के कांटे हो सकते हैं..... चन्दन नहीं. क्षमा कीजियेगा... किसी भी रचना को पढते हुये मुझे गहराई में जाने की बुरी आदत है और जो दिल में आये वह लिखने की और भी बुरी आदत.. यह मेरी व्यक्तिगत राय है इसे अन्यथा न लीजियेगा और स्नेह बनाये रखियेगा.

के द्वारा: Mohinder Kumar Mohinder Kumar

प्रिय चन्दन जी, सादर, आपने मेरे मूल प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया बल्कि ये समझाया की सब धर्मों के मूल में क्या निहित है मैंने किसी अन्य धर्म अथवा संगठनों के विषय में आपसे कोई प्रश्न नहीं किया और इस बात से निश्चिन्त रहे की इस तरह के तर्क से हमारे आपसी रिश्तों में कुछ तनाव आएगा बल्कि में हमेशा खुली बहस का समर्थक रहा हूँ ..... वो तो अलीन जी ने चैलेन्ज कर दिया है तो हम उतर आये मैदान में वर्ना तो हमारे अन्दर भी हिंदुत्व के कूट कूट कर भरे हैं कोई कुछ भी कहे - करे सोते ही रहते हैं ....... हाहाहा और अलीन जी आप भी दायें बाएं की बात छोड़ कर प्रश्नों का उत्तर दें.........! वर्ना तो में आपके ब्लॉग पर एक कमेन्ट कम करूंगा हाहाहा

के द्वारा: munish munish

आज भारतीय राजनीति में हिंदुत्व के नाम पर चक्रवात आया हुआ है , आप सोचीय क्यूँ जरुरत पड़ी की एक हिन्दू राजनेतिक नेता एक दुसरे हिन्दू राजनेतिक नेता का इतना कडा विरोध कर रहा है , इनके मतान्तरों से यह अभिप्रयाय निकलता है की कंही ना कंही तथाकथित राजनेतिक पार्टी या उसके हिंदुत्ववादी सोच में खोट है और सायद वह हिंदूवादी सोच की दकियानूसी मानसिकता में उलझा हुआ है ,जिसका मुलभुत उद्देश्य इक वर्ग ,वर्ण की बात कर इक राष्ट्रिय साम्प्रदायिकता को जन्म देना है ! राजकमल उर्फ कसाई जी , आपका आभार प्रकट करने के लिए मेरे पास फंड की बेहद कमी हो गई है जल्द ही लोन के लिए अप्लाई करके + अरेंज करके आपका कर्ज चुकता करने की पुरजोर कोशिश करता हूँ – चन्दन राय – “खुशबूदार” :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :( ;) :o 8-) :|:) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| (इस देश में अपने स्वार्थ के लिए हरेक सही चीज को तोड़ा मरोड़ा गया है और गलत तरीके से पेश किया गया है तथा देश की भोली और समझदार दोनों प्रकार की जनता को अच्छी तरह से मूर्ख बनाया गया है * ) जय बोलो भगवान शंकर महादेव महाराज जी की सदाशिव जी की

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

प्रिय मित्रजनो , धर्म कोई भी हो वह सभी के सद्भाव उत्थान प्रेमभाव की बात कहता है ,कोई धरम अत्याचार ,दुराचार ,आतंक को सही नहीं ठहराता ,उसकी नजर में सब समान है ======== जिस तरह अलाह या राम एक है उसी तरह जितने चाहे धरम मान लो सब धरम का मूल एक है , ———— हमारे देश में सभी संगठनों ,व्यक्ति ,संस्था को अपनी बात एक निश्चित दायरे या विरोध का एक सवेधानिक तरीका है , पर कोई भी व्यक्ति इस सीमा को लान्खता है तो उस पर अंकुश लगाना अनिवार्य है , और यदि उसकी प्रामिन्कता के सबूत हमारी न्याय प्रणाली उपयुक्त मानती है तो जरुर कारवाई होनी चाहिय , पर जिन संस्था का लेख में वर्णन है उनकी भाषा ,आचरण ,संवाद में एक सार्वजानिक अभिव्यक्ति का और राष्ट्रिय एकता पर प्रहार का दोष पाया गया है ! सायद आप इसे ना नकारे !

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

सभी मित्रो , धर्म कोई भी हो वह सभी के सद्भाव उत्थान प्रेमभाव की बात कहता है ,कोई धरम अत्याचार ,दुराचार ,आतंक को सही नहीं ठहराता ,उसकी नजर में सब समान है ======== जिस तरह अलाह या राम एक है उसी तरह जितने चाहे धरम मान लो सब धरम का मूल एक है , ------------ हमारे देश में सभी संगठनों ,व्यक्ति ,संस्था को अपनी बात एक निश्चित दायरे या विरोध का एक सवेधानिक तरीका है , पर कोई भी व्यक्ति इस सीमा को लान्खता है तो उस पर अंकुश लगाना अनिवार्य है , और यदि उसकी प्रामिन्कता के सबूत हमारी न्याय प्रणाली उपयुक्त मानती है तो जरुर कारवाई होनी चाहिय , पर जिन संस्था का लेख में वर्णन है उनकी भाषा ,आचरण ,संवाद में एक सार्वजानिक दोष पाया गया !

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

मैंने यही माना है और यही लिखने का उद्देश्य भी की हिन्दुस्तान का हिंदुत्व सबसे उदारवादी सोच है और कर्म है , यदि हम पर कोई आक्षेप करता है तो क्या हम उदारवादी सोच त्याग दे ,हम भी अशभय ,दुराचारी कार्य में सम्मिलित हो जाए ,आज जब विश्व हमारी जैविक विविधतता के पश्चात हमारी राष्ट्रिय एकता का उदाहरण देता तो क्या हम उसे खंडित कर दे , यदि कोई मुस्लिम विरोधी बात कहता है ,वो भी चंद आतंकवादिओं के कारन तो जरा वह इतिहास और अपना मन खंगाल ले की भारत को आजादी दिलाने वाले क्रान्तिकारिओन में मुस्लिम सामान रूप से सहभागी थे , और इसी सनुचित मानसिकता ने देश को बाट दिया ,और समय पर दंगों का घात ,आतंकवाद इसी अलगाववादी रुग्न सोच का नतीजा है , मे अपनी कविता के दो पंक्तिया कहना चाहूंगा , कौन कहता है लहू मत उबालो ,म्यान से तलवार न खींचो , में कहता हूँ मेरे भाई जन्हा देखो मुहब्बत ,अदब से सर झुका लो !

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

आदरणीय अनिल जी, अब आप मुद्दों और तर्कों से हटकर इधर उधर की बातें कर रहे हैं इस लेख पर आपने एक दावा किया था की .........."इससे पहिले कि मैं वाक्-युद्ध की रणभेरी बजाऊ, सभी सम्मानित, आदरणीय और माननीय ब्लागरों से विनती करता हूँ कि अपनी उपलब्धि को किसी तिजोरी में बंद कर दे. वरना फिर उनको मुझसे शिकायत रह जाएगी…….और जितना होमवर्क करना है कर ले ///////इतिहास से लेकर ग्रंथों तक …गीता से लेकर कुरआन तक ..और भूत से लेकर भविष्य तक ……………मतलब अपनी पूरी तैयारी कर ले ……………वरना मुझसे ज्यादा उन्हें खुद से शिकायत रह जाएगी…………!" अब जब हम चर्चा करने को तैयार हैं तो आप या आपके ब्लॉग लेखक चन्दन जी दोनों ने ही मेरे सामान्य से प्रश्नों के उत्तर अभी नहीं दिए जिसके आधार पर चर्चा करनी है हम कुछ तैयारी करें आपसे शास्त्रार्थ की ............. ! परन्तु आप भी दायें बाएं की बात ज्यादा कर रहे हैं और चंदनजी तो लौटे ही नहीं .............. ;)

के द्वारा: munish munish

आदरणीय अनिल जी, आप १४ वर्ष की आयु में आर एस एस से जुड़े और १ वर्ष में आपको सारी बातें समझ आ गयीं और आपने निर्णय कर लिया की ये देशद्रोही संगठन है आपके बचपने का निर्णय आप पर आज तक हावी है इसका सीधा सा अर्थ है की या तो आप अभी भी बचपन में ही जी रहे हैं, या आपके लिए तथाकथित किसी भी महापुरुष के विचारों का महत्त्व ही नहीं है इसीलिए आपने उस बचपने के विश्लेषण को उन महापुरुषों के विश्लेषण से अधिक महत्त्व दिया. और शायद इसीलिए आपने मेरे द्वारा दिए गए कुछ उदाहरणों पर चर्चा नहीं की क्योंकि आपको पता है की जाने अनजाने आपका विश्लेषण है तो गलत ही ........! रही बात अशांति अधर्म की तो वो आप जैसे नासमझ लोगों के कारण है डरपोक लोगों की अहिंसा, अहिंसा नहीं कायरता है जो आँख मूँद कर हो रहे अन्याय और अधर्म को अहिंसा के नाम पर इसलिए सहते हैं क्योंकि उनके बसकी कुछ करना नहीं है और जो लोग कुछ कर सकते हैं वो अहिंसा का दामन केवल सम्मुख व्यक्ति को एक बार समझाने के लिए करते हैं जैसे महाभारत के युद्ध से पूर्व कृष्ण ने किया था या लंका युद्ध से पूर्व अंगद को दूत बनाकर भेजकर राम ने किया था ..........!

के द्वारा: munish munish

जी, जब मैं rss से जुड़ा तो उस समय मेरी उम्र १४ की हो रही थी और मुझे यह भी पता नहीं था कि इस भारत में कोई सांप्रदायिक संगठन भी हैं जो हमारे बीच नफ़रत पैदा कर रहे हैं और देश भक्ति के नाम पर देश द्रोहिता कर रहे हैं. जब मैं इससे से जुड़ा तो बस इतना ही मुझे बताया गया था कि यह एक सामाजिक संस्था हैं जो समाज सेवा कर रही हैं और इसके सदस्य स्वयम सेवक हैं.............वो तो उसमे शामिल होने के बाद पता चला कि उसके अधिकतर सदस्य राष्ट्र द्रोही हैं और खुद उन्ही के मुंह से उनके कुकर्मों को सुना और देखा उस नफ़रत के बीज को जो वो इस देश में बो रहे हैं............! महमूद गजनवी, ओसामा बिन लादेन जैसे लोग भी अपनों के नज़र में क्रन्तिकारी और देश भक्त हैं...........और यह स्वार्थ ही हैं मेरा नहीं बल्कि आप जैसे लोगों का जो यक़ीनन इस दुनिया में सबसे अधिक हैं और यही कारण हैं चारों तरफ अशांति और अधर्म का...................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

मुस्लिम आक्रांता की कब्र हेतु 25 लाख और हिन्दू राजा का स्मारक उपेक्षित… लानत भेजो ऐसी "शर्मनिरपेक्षता" पर क्या आपने इब्राहीम लोदी का नाम सुना है? ज़रूर सुना होगा… क्या आपने हेमचन्द्र विक्रमादित्य (हेमू) का नाम सुना है? क्या कहा – याद नहीं आ रहा? इतनी आसानी से याद नहीं आयेगा… असल में हमें, बाबर, हुमायूं, अकबर, शाहजहाँ, औरंगज़ेब आदि के नाम आसानी से याद आ जाते हैं, लेकिन हेमचन्द्र, सदाशिवराव पेशवा, पृथ्वीराज चौहान आदि के नाम तत्काल दिमाग में या एकदम ज़ुबान पर नहीं आते… ऐसा क्यों होता है, इसका जवाब बेहद आसान है - हमारी मैकाले आधारित और वामपंथी शिक्षा प्रणाली ने हमारा “ब्रेन वॉश” किया हुआ है। सबसे पहले ऊपर दिये गये दोनों राजाओं का संक्षिप्त परिचय दिया जाये… इब्राहीम लोदी कौन था? इब्राहीम लोदी एक मुस्लिम घुसपैठिया था जिसने मेवाड़ पर आक्रमण किया था और राणा सांगा के हाथों पराजित हुआ था। इब्राहीम लोदी के बाप यानी सिकन्दर लोदी ने कुरुक्षेत्र के पवित्र तालाब में हिन्दुओं के डुबकी लगाने पर रोक लगाई थी, और हिमाचल में ज्वालामुखी मन्दिर को ढहा दिया था, उसने बोधन पंडित की भी हत्या करवा दी थी, क्योंकि पंडित ने कहा था कि सभी धर्म समान हैं। इब्राहीम लोदी का दादा बहोल लोदी अफ़गानिस्तान से आया था और उसने दिल्ली पर कब्जा कर लिया था। ऐसे महान(?) वंश के इब्राहीम लोदी की कब्र के रखरखाव और मरम्मत के लिये केन्द्र और हरियाणा सरकार ने गत वर्ष 25 लाख रुपये स्वीकृत किये हैं, जबकि रेवाड़ी स्थित हेमू के स्मारक पर एक मस्जिद का अतिक्रमण हो रहा है। अब जानते हैं राजा हेमू (1501-1556) के बारे में… “राजा हेमू” जिनका पूरा नाम हेमचन्द्र था, हरियाणा के रेवाड़ी से थे। इतिहासकार केके भारद्वाज के शब्दों में “हेमू मध्यकालीन भारत का ‘नेपोलियन’ कहा जा सकता है”, यहाँ तक कि विन्सेंट स्मिथ जिन्होंने समुद्रगुप्त को भी नेपोलियन कहा था, मानते थे कि हेमू को भी भारतीय नेपोलियन कहा जाना चाहिये। हुमायूं के पतन के बाद हेमचन्द्र ने बंगाल से युद्ध जीतना शुरु किया और बिहार, मध्यप्रदेश होते हुए आगरा तक पहुँच गया। हेमचन्द्र ने लगातार 22 युद्ध लड़े और सभी जीते। आगरा को जीतने के बाद हेमचन्द्र ने दिल्ली कूच किया और 6 अक्टूबर 1556 को दिल्ली भी जीत लिया था, तथा उन्हें दिल्ली के पुराने किले में “विक्रमादित्य” के खिताब से नवाज़ा गया। 5 नवम्बर 1556 को अकबर के सेनापति बैरम खान की विशाल सेना से पानीपत में उसका युद्ध हुआ। अकबर और बैरम खान युद्ध भूमि से आठ किमी दूर थे और एक समय जब हेमचन्द्र जीतने की कगार पर आ गया था, दुर्भाग्य से आँख में तीर लगने की वजह से वह हाथी से गिर गया और उसकी सेना में भगदड़ मच गई, जिससे उस युद्ध में वह पराजित हो गये। अचेतावस्था में शाह कुलीन खान उसे अकबर और बैरम खान के पास ले गया, अकबर जो कि पहले ही “गाज़ी” के खिताब हेतु लालायित था, उसने हेमू का सिर धड़ से अलग करवा दिया और कटा हुआ सिर काबुल भेज दिया, जबकि हेमू का धड़ दिल्ली के पुराने किले पर लटकवा दिया… हेमू की मौत के बाद अकबर ने हिन्दुओं का कत्लेआम मचाया और मानव खोपड़ियों की मीनारें बनीं, जिसका उल्लेख पीटर मुंडी ने भी अपने सफ़रनामे में किया है… (ये है “अकबर महान” की कुछ करतूतों में से एक)। एक तरह से देखा जाये तो हेमचन्द्र को अन्तिम भारतीय राजा कह सकते हैं, जिसके बाद भारत में मुगल साम्राज्य और मजबूत हुआ। ऐसे भारतीय योद्धा राजा को उपेक्षित करके विदेश से आये मुस्लिम आक्रांता को महिमामण्डित करने का काम इतिहास की पुस्तकों में भी किया जाता है। भारत के हिन्दू राजाओं और योद्धाओं को न तो उचित स्थान मिला है न ही उचित सम्मान। मराठा पेशवा का साम्राज्य कर्नाटक से अटक (काबुल) तक जा पहुँचा था… पानीपत की तीसरी लड़ाई में सदाशिवराव पेशवा, अहमदशाह अब्दाली के हाथों पराजित हुए थे। भारत में कितनी इमारतें या सड़कें सदाशिवराव पेशवा के नाम पर हैं? कितने स्टेडियम, नहरें और सड़कों का नाम हेमचन्द्र की याद में रखा गया है? जबकि बाबर, हुमायूँ के नाम पर सड़कें तथा औरंगज़ेब के नाम पर शहर भी मिल जायेंगे तथा इब्राहीम लोदी की कब्र के रखरखाव के लिये 25 लाख की स्वीकृति? धर्मनिरपेक्षता नहीं विशुद्ध “शर्मनिरपेक्षता” है ये…। धर्मनिरपेक्ष(?) सरकारों और वामपंथी इतिहासकारों का यह रवैया शर्मनाक तो है ही, देश के नौनिहालों का आत्म-सम्मान गिराने की एक साजिश भी है। जिन योद्धाओं ने विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ़ बहादुरी से युद्ध लड़े और देश के एक बड़े हिस्से में अपना राज्य स्थापित किया उनका सम्मानजनक उल्लेख न करना, उनके बारे में विस्तार से बच्चों को न पढ़ाना, उन पर गर्व न करना एक विकृत समाज के लक्षण हैं, और यह काम कांग्रेस और वामपंथियों ने बखूबी किया है। इतिहास की दो महत्वपूर्ण घटनायें यदि न हुई होतीं तो शायद भारत का इतिहास कुछ और ही होता – 1) यदि राजा पृथ्वीराज चौहान सदाशयता दिखाते हुए मुहम्मद गोरी को जिन्दा न छोड़ते (जिन्दा छोड़ने के अगले ही साल 1192 में वह फ़िर वापस दोगुनी शक्ति से आया और चौहान को हराया), 2) यदि हेमचन्द्र पानीपत का युद्ध न हारता तो अकबर को यहाँ से भागना पड़ता (सन् 1556) (इतिहास से सबक न सीखने की हिन्दू परम्परा को निभाते हुए हम भी कई आतंकवादियों को छोड़ चुके हैं और अफ़ज़ल अभी भी को जिन्दा रखा है)। फ़िर भी बाहर से आये हुए आक्रांताओं के गुणगान करना और यहाँ के राजाओं को हास्यास्पद और विकृत रूप में पेश करना वामपंथी "बुद्धिजीवियों" का पसन्दीदा शगल है। किसी ने सही कहा है कि “इतिहास बनाये नहीं जाते बल्कि इतिहास ‘लिखे’ जाते हैं, और वह भी अपने मुताबिक…”, ताकि आने वाली पीढ़ियों तक सच्चाई कभी न पहुँच सके… इस काम में वामपंथी इतिहासकार माहिर हैं, जबकि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण में… इसीलिये अकबर और औरंगज़ेब का गुणगान करने वाले लोग भारत में अक्सर मिल ही जाते हैं… तथा शिवाजी की बात करना “साम्प्रदायिकता” की श्रेणी में आता है… जाते-जाते एक बात बताईये, आपके द्वारा दिये गये टैक्स का पैसा इब्राहीम लोदी जैसों की कब्र के रखरखाव के काम आने पर आप कैसा महसूस करते हैं? --------------------------------- --------------------------------- With deepest regards, Anil Kumar Jharotia aniljharotia@yahoo.com

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मैं इस बात की चेतावनी कई बार दे चूका हूँ , कि ये एक साजिस है जो हमारे हिन्दू सनातन धर्मं के खिलाफ है , हमारे हिन्दू धर्म में दूधों -नहाओ , पूतों फलो का आशीर्वाद दिया जाता था ..जिसे साजिस के तहत दुस्प्रचारित किया गया , , सोचो जब विक्रमी सम्वंत शुरू हुआ था तब से सातवीं शताब्दी तक भारत सोने की चिड़िया बन चूका था दूध की नदियाँ बहती थी , सोने चांदी के विशाल भण्डार थे ..गुरुकुल की परंपरा के कारण हमारा शैक्षिक स्तर विश्व भर में सबसे उन्नत था , हमारा निर्यात पूरे विश्व में चौतीस प्रतिशत था , प्रत्येक प्रकार की उन्नत वस्तु अति उत्तम किस्म की बनाई जाती थी , ये तब होता था जब हमारी ( हिन्दू धर्म की ) संख्या विश्व में काफी ज्यादा थी , हमारा भारत वर्तमान के इरान से लेकर म्यमार तक और इंडोनेसिया से लेकर श्री लंका तक था , तब इसका नाम आर्याव्रत था ...................और आज हमारी संस्कृति पर चौतरफा हमला किया जा रहा है ....हमें कहा जा रहा है ..अपनी मात्र भाषा हिंदी छोडो ...अंग्रेजी अपनाओ ...नहीं तो पिछड़ जाओगे ....हुआ क्या हम आगे बढे ???? गौमाता - हमारी अर्थव्यवस्था कि रीड थी ..दूध और उससे बने उत्पादनों का विश्व भर में निर्यात किया जाता था ...हर-घर में गौमाता होती थी और पूजी जाती थी .....और आज साजिस के तहत उसकी हत्या के कत्लखाने हज़ारों कि संख्या में मुल्लों को खुश करने के लिए खोले जा रहे .........उसका मांस खाया जा रहा है .........मुझे समझ में नहीं आता कि भाए हम जी क्यों रहे है इतना अपमान सहकर ..कोई हमारी माँ को हमारे सामने कि काटकर खा रहा है ..और हम शांत होकर देख रहे है ...और ये हो तो तब रहा है जब कोंग्रेस सरकार उनकी मदद कर रही है लाईसेंस देकर ...........हम ये कैसी तरक्की कर रहे है ??????क्या हम आगे बढ़ रहे है हम अपने शालीन ( धोती कुरता और साडी -सूट- सलवार )परिधानों को छोड़कर कुल्हे से नीचे खिसकती जींस की पैंटों और तंग होती स्कर्टों -टापों गर्मी में भी बंद गले वाले कोट और पैंट , टाई...प्रकृति के विरुद्ध परिधानों का चयन करते करते है .......तो क्या हम आगे बढ़ रहें है ?????? हम दो हमारे दो ...का नारा अब कुछ इस तरह से प्रचारित किया जा रहा है ---शेर का बच्चा एक ही अच्छा ...........खुद तो दुसरे के धर्मो के लोगों को भी तोड़कर अपने में मिलकर अपनी संख्या में वृद्धि कर रहे है ..और स्वयं तो संख्या वृद्धि में लगे ही हुए है ...और हमें ये कहा जा रहा है की आप एक या दो बच्चे पैदा करो ..पढ़ -लिख कर डॉक्टर या इंजीनयर बनेगे ....और खुद ज्यादा पैदा करके अपनी जनसँख्या बढ़ा रहे है ...लोकतंत्र है भाई नेता तो उन्ही का बनेगा ...फिर हमारे डॉक्टर और इंजिनियर उनके नोकर होंगे ,.....मतलब ...खुद मियाँ फजीहत दूसरों को नसीहत .........तो क्या हम आगे बढ़ रहे है .... गलत...............गलत ................गलत ............. हम आगे अपने अस्तित्व को खुद ही समाप्त करने पर जोर - शोर से तुले हुए है .....आत्महत्या कर रहे है .......अभी भी वक्त है हिन्दुओ गरजो दहाड़ी ...शेरों की संख्या में बढ़ोतरी होनी चाहिए ..अपना वर्चस्व कायम करना होगा ....अगर ऐसा नहीं किया तो गीदड़ों की संख्या इतनी बढ़ जायेगी की ...शेर का बच्चा एक ही अच्छा ...कुछ भी न कर पायेगा ...नोच --नोच कर खा जायेंगे ये गीदड़ ...जैसा की कोसीकलां में हुआ है अभी हाल ही में ...हमें बचने कोई भी नहीं आएगा .....क्योंकि कुछ हमारे ही भाई मतिभ्रष्ट होकर सेकुलर बन गए है और मुल्लों का साथ दे रहे है ...मीडिया भी नल्ले-पाए , लेग पीस खाकर बोटी नोचकर इन्ही के गुण गाता है ....... सोचो ..सच्चे भारतीय सपूतो सोचो ......विचार करो ...नहीं तो ...मिट जाओगे ...जिस तरह से हिन्दुस्तान मिट रहा है .... इतिहास भी साक्षी है जब - जब हिन्दू घटा या बंटा....... भारत का क्षेत्रफल भी घटा या बंटा है ---- अआप खुद इतिहास देख लीजिये .......सौ वर्ष पहले हमारा भारत कैसा था ....और आज कैसा है .......और ऐसा ही रहा तो आने वाले सौ -वर्षों में क्या रहेगा ?? जय श्री राम जय हिन्दू सनातन धर्मं क़ी भारत माता की जय आपका दोस्त --सुदेश शर्मा ,

के द्वारा:

चन्दन जी .... हिदुओ के पार्टी आपकी जानकारी उत्तम है वन्दना है आपकी.... जुलम बर्दास्त करते रहना चाहिए हिन्दुओ को बेटी को लव जिहाद में छेड़े तो माँ को भी पेश करदेना चाहिए .... किया का जीकर न कर आप प्रतिक्रिया पर बोल रहे है.... यदि रेल में हिदुओ को न जलाया जाता और गोधरा होता तो सर निंदनीय होता कोई शक नहीं ... पर गोधरा हुआ क्यों? इस से लगता है आपको कोई लेना देना नहीं .... आज एक १२ साल कि बच्ची को घर से उठा कर ले गए और तीन दिन में इस कदर नोचा उसे कि वो मर ही गयी.... कोई बड़ी बात नहीं कि बाद मरने के उसकी मृत देह को उन कुत्तों ने न झंझोड़ा होगा .... प्रतापगढ़ पर क्या लिखोगे.... लिखो .... कश्मीर से हिंदू काट काट कर बाहर निकाले गए लिखो उस पर... मथुरा पर लिखो.... नहीं लिखोगे ... मै जानता हू क्युकि सच के पक्ष में बोलना नेताओं कि फितरत ही नहीं बची... हिन्दुओ के पतन पर नजर नहीं वो खंडित दर खंडित होता जा रहा है नहीं दिखा .... सत्ता में बैठे लोग क्या कर रहे है नहीं दिखा ..... क्या दिखा.....हिन्दुओ ने बचाव में जो किया वो दिखा .....  हम आज ऐसे स्थान पर इसी मानसिकता के चलते पहुचे है..... मै रहता हू नरोडा पाटिया मै जानता हू क्या हुआ आप कुछ दिन आकार रहो यहाँ दूर बैठ कर इस तरहा लिखना सच का साथ नहीं है .... मै जानता हू आप कि भावना अन्यथा नहीं हो सकती .... आपका पक्ष सच होता यदि ये क्रिया कि प्रतिक्रया ना होती पर अभी ये सर्वथा निन्दनीय बन गयी है.... और मै निंदा करता हू.... हां आपके दिल में शांती के उस जज्बे की क़द्र भी.... पर वो अधूरा है ....

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लोग कहते हैं "हिंदुस्तान में अधिकतर आतंकवादी बनते नहीं बल्कि बनाये जाते हैं……………एक विशेष कौम को जान बुझकर उकसाया और भड़काया जाता हैं" ये वही विशेष कौम है जिसके लोग सदा से ही लूट-पाट करते आये हैं। मै ज्यादा तो नही जानता लेकिन मैने इतिहास की कुछ घटनायें पढ़ा है। जिस पन्थ का उद्भव ही मार-काट के उद्देश्य से हुआ है उस पन्थ के लोग भला सही कैसे हो सकते हैं। आर एस एस संगठन न हो तो हिन्दू का विनाश होते देर न लगेगी। भ्रष्ट राजनेता इस्लाम को केवल वोट बैंक हेतु पूरी छूट देंगे। फिर न तो राम होंगे न ही श्याम। देवादिदेव महादेव का नाम नही होगा। हर तरफ कम बुद्धि के जीव दिखाई देंगे। दाढ़ी बढ़ी हुई, मूछें गायब, विचित्र वेश-भूषा यानि हर तरफ मुसलमान नजर आयेंगे। ये मै साफ कहूँगा कि ये मुसलमान किसी राक्षस से कम नही होते। फिर हर तरफ हड्डियाँ ही हड्डिया होगीं। बिना अस्त्र-शस्त्र के उठाये कुछ नही होता। यदि आर एस एस ऐसा करता है तो बिल्कुल सही है। मै १९९९ से इसे जानता हूँ। आज तक इसमे केवल भारत की सुरक्षा के लिये ही बताया गया है। अगर कोई इसमे आया और उसे लगा कि ये मार-काट सिखाता है तो जरा हमे भी बताये। क्या वो मार-काट बिना किसी मतलब के (जैसा कि मुसलमान जेहाद के नाम पर करते है) करने को कहते हैं। ये समय वो नही कि आप लोग आपस मे लड़कर फिर से किसी अन्य को अपने देश पर राज्य करने दें। समय आ गया है अपनी सत्ता अपने हाथ मे लेने का। यदि त्रेता मे राम न लड़ते तो भारत पर राज्य रावण करता। लेकिन उन्होने शस्त्र उठाये। फिर हम क्यों न उठायें। बिना शस्त्र उठाये शान्ति की कल्पना करना बे-ईमानी है। जब बात से बात न बने तो शस्त्र उठाना पड़ेगा। धर्म की रक्षा प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है। आज भारत के मुसलमान वो नीच हैं जिनके पूर्वज तलवारों के आगे झुक गये। कर न देने के लालच मे धर्म बेंच दिया। यदि ये उस समय हथियार उठाते तो दशा भिन्न होती। महान शायर अल्लामा इकबाल, जिनके पूर्वज पण्डित थे, ने अपने जीवन के प्रथम दौर मे ही मात्र हिन्दू मुस्लिम एकता पर लिखा यानि १८९९ से १९०५ तक। फिर क्या हुआ मुसलमानी पढ़कर ये भी उसी जेहाद मे रम गये। बाद की सारी रचनाये मुस्लिमो को उकसाने वाली थीं। ये वो हैं जिन्होने बँटवारा करा दिया हिन्दूस्तान का। फिर क्या हक रह जाता है इन्हे यहाँ रहने का। बात साफ है। आकड़े देखिये, १९४७ से आज तक, किस तरह इनकी जनसंख्या बढ़ी है। ये यहाँ नही रहेंगे तो इनके नाम की राजनीति नही होगी। फिर भारत अपना दम पा सकेगा।

के द्वारा:

अनिल जी मैं ये तो नहीं जानता की आप किस श्रेणी के विश्लेषक हैं लेकिन हर विश्लेषक अपने विश्लेषण को सत्य या सत्य के करीब ही मानता है........ आपने आर एस एस के विषय में विश्लेषण कब किया ये जानना महत्वपूर्ण होगा क्योंकि इस कांग्रेसनीत सरकार से पूर्व कांग्रेसी नेताओं ने चाहे वो सरदार पटेल हों या पंडित नेहरू, शास्त्रीजी स्वयं महात्मा गांधी और डॉ आंबेडकर तक ने आर एस एस को देशभक्त संगठन माना था पूर्व प्रधानमन्त्री पी वी नरसिम्हाराव ने भी आर एस एस के विषय में कभी कोई टिप्पड़ी नहीं की हो सकता हैं उन लोगों का विश्लेषण आप के विश्लेषण से ज्यादा दूर हो...... ! परन्तु आपके विश्लेषण से ये बात तो स्पष्ट हो जाती है की आर एस एस के विषय में कुछ भी नहीं जानते, या जानना ही नहीं चाहते एक पूर्व नियोजित धारणा पहले से बना रखी है

के द्वारा: munish munish

प्रिय चन्दन जी हिंदुत्व सर्व धर्म समभाव की बात तो करता है परन्तु आपने ये स्पष्ट नहीं किया की हिन्दू - हिन्दुत्व के आधार पर धर्म की परिभाषा क्या है इसलिए किस तरह के धर्म के साथ समभाव रखना है वो स्पष्ट हो जाएगा .......! फिर ज़रा चर्चा आसानी से हो सकेगी. आपके इसी लेख के एक कमेन्ट में श्री मान अनिल " अलीन" जी ने आर एस एस जैसे संगठनों पर प्रतिबन्ध लगाने की बात की है , आर एस एस पर सरकार पहले भी तीन बार प्रतिबन्ध लग चुका है और हर बार कोर्ट ने प्रतिबन्ध को हटा दिया तो क्या आप भारतीय न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ फिर से प्रतिबन्ध चाहेंगे ........ एक और प्रश्न मंच के इतिहासकारों से की कब इस भारतभूमि के लोगों ने बाहर से आये लोगों का विरोध नहीं किया या कब वो उनके साथ मेल मिलाप से रहे ........ आगे की चर्चा इन समाधानों के बाद

के द्वारा: munish munish

चंदनजी, लेख पढ़ कर लगा मानो आजकल हिन्दू होना एक गाली हो गई है. कटर हिन्दू होना तो इक महा पाप हो चला है. भाई साब पहले तो आपने दिमाक से ये फितूर निकालो के हिन्दू होना कोई गुनाह है. स्वामी विवेकानंद जी ने सिखाया - गर्व से कहो हम हिन्दू हैं. उस व्यक्ति ने जिसने सर्व धर्मं सभा मैं हिन्दुओं का मस्तक ही नहीं सारे हिंदुस्तान का सीर ऊँचा किया था. हमको जीने दो, और खुद बी जिओ, हमसे उलझाना छोड़ दो सारी उलझन मिट जाएगी. सब लोग याद रखे की हिंदुस्तान के लोग कभी नहीं गए बाहर दुसरे मुल्कों पर चढाई करने. लोग बहार से आये. और ऐसी बीस बेल बो कर गए की आज तक उसकी फसल हम सब काट रहे हैं. कभी कभी आक्रामकता ही बचाव का एकमात्र रास्ता होती है. चेतो भाई चेतो!!

के द्वारा:

आपके लगाने और न लगने से सच्चाई छुप नहीं जाएगी........................और न ही छुपाने से ! यदि सिमी जैसे संगठन असामाजिक समूह थे तो निश्चय ही यह सब भी है पर आज तक इन पर रोक क्यों नहीं लगा..............स्वाभाविक सी बात है कि इनकी संख्या समाज और हरेक व्यवस्था में अधिक है और कोई भी व्यवस्था खुद को दोषी कैसे ठहरायेगी........! हमारे देश में सांप्रदायिक हिंसा होते थे . परन्तु विस्फोट नहीं ............क्या कारण है कि RSS जैसे संगठन का इसराइल से युद्ध प्रशिक्षण लेने के बाद हिंदुस्तान में विस्फोट होना शुरू हुआ. स्पष्ट है कि बहुतों विस्फोटों में इन सबका का हाथ है......और इससे पुरे मुस्लिम कौम को जोड़ा गया ताकि उन्हें बदनाम किया जाय .! उन्हें या तो देश के बाहर निकला जाय या फिर उन्हें अपने अधीन किया जाय. मैं दुसरे मुल्कों की बात नहीं करना चाहता क्योंकि फिलहाल बात हिन्दुस्तान की हो रही है तो हिंदुस्तान की करूँगा. और हिंदुस्तान में अधिकतर आतंकवादी बनते नहीं बल्कि बनाये जाते हैं...............एक विशेष कौम को जान बुझकर उकसाया और भड़काया जाता हैं ताकि वो कोई गलत कदम उठाये और उन्हें दोषी ठहराया जाय................और यह सब मैं अपने आखों से देखा हूँ> यहाँ तक कि यदि उनका जुलुस निकलता है तो उनके द्वारा लगाये गए नारे को तोड़-मोड़कर पेश किया जाता तथा इसे असामाजिक और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों से जोड़ा जाता हैं............! मैं किसी भी समाज विशेष के विरोध में नहीं बोलना चाहता पर यदि कोई खुद को अच्छा या बेहतर प्रस्तुत करने की कोशिश करेगा तो मुझे हकीकत प्रस्तुत करना ही पड़ेगा........! हकीकत तो यह है कि आज जो कुछ भी है ....यह सिर्फ वर्चस्व और स्वार्थ की लड़ाई है ................यहाँ शांति, प्रेम, भाईचारा, उदारता चाहता कौन है और यदि चाहता है तो इस शहर की हालत ऐसी क्यों है.............. फिलहाल एक लिंक दे रहा हूँ उसपर जाइये .............. http://merisada.jagranjunction.com/2012/01/29/%E0%A4%90-%E0%A4%85%E0%A4%A6%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%94%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%87%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A5%8B/

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

भैया, हमें भी पता है कि हिन्दू कितना चुप थे और आज कितना चुप है. वैसे आप कब से हिन्दू बन गए. वो आज के pariwesh ko dekhkar saaf dikhta hai aur haa yah is blog par dikh raha hai aap sab ki udarata aur सहिशुनता. इतिहास मैंने भी पढ़ाहै और आज को बहुत अच्छा तरह से देख रहा हूँ.............जब हमारा देश धन-धन्य से परिपूर्ण था तो भला हम किसी दुसरे मुल्क में क्या ख़ाक छानने जायेंगे....! इतिहास को फिर से पढ़िए .............यही खुद को हिन्दू कहने वाले आपस में लड़ते रहते थे और अपने भाइयों का क़त्ल आम किये. साथ ही स्वार्थ, परंपरा , उंच-नीच और इज्जत के नाम पर अपने ही माँ बहनों को जिन्दा जलाये और साथ ही उनकी इज्जत से खेले भी. अरे जब हमारे पास सबकुछ था फिर भी हम उसका सही सदुपयोग नहीं किये और अपनों को ही लूटे तो फिर भूखे और नंगे लोग आकर हमें लूटे गतो कौन सा बुरा कर दिए. आखिर धन, दौलत, जमीं और जोरू कौन नहीं चाहता. मुझे तो इसमे कोई बुराई नहीं लगती कि जो बाहरी लोग हम पर आक्रमण किये क्योंकि अपनी आवश्यकताओ के लिए कौन नहीं लड़ता............ एक चीज बताये ......यदि वो सभ असभ्य, जंगली और लालची थे तो हम सब क्या थे जो सब कुछ हमारे पास रहते हुए भी इतने नीच हरकत किये जो शायद ही कोई इतिहास में किया होगा.............. यदिबाहरी आक्रमण कारियों की जगह पर हिन्दू होते तो निश्चय ही ये भी वैसा करते परन्तु सामने से नहीं बल्कि पीछे से वार करते...........और भूख और हवस के मारे एक सगा बेटा अपने ही माँ और बाप को नहीं छोड़ता............. अरे इतिहास की बात छोडिये.....आज को देखिये ......आज से ही स्पष्ट हो जायेगा कितना घिनौना चेहरा हैं.....हिन्दुओ का......! अब अपना कान बंद कर लीजिये और आखें खोलिए............. .......................और अंत में बस इतना ही कहूँगा कि हमेव हिन्दू-मुस्लिम से नहीं लड़ना है और नहीं कोई महान है और न ही बेहतर .................! इंसान अपने स्वार्थ और आवश्यकता के कारण यह सब कुछ करता जाता है.......यदि वास्तव में सुधार चाहते हैं हम लोग देश और समाज का तो हमें अपनी गन्दी मानसिकता से लड़ना होगा...........................और हाँ फतवा -मत्वा की बात छोडिये ...........जब हिन्दुओ की कोई एक सोच नहीं है और कोई एक विचार धारा नहीं तो ख़ाक फतवा जारी करेंगे..............वेदों के अर्थों को अनर्थ निकालकर लाखों कारणों देवी देवताओ को स्वार्थ, डर और अज्ञान वश पूजने का काम करने लगे....................और जो आप सम्मान की बात कर रहे हैं ...वो आप लोग यहाँ सम्मान दिखा दिए हैं...........

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

हिंदुत्व कभी तोड़ने की बात नहीं करता तो आज के तथाकथित धर्म निरपेक्षो को इससे डर क्यों लगता है ..तो आप क्या कर रहे हैं.......मेरे इस छोटे से जीवन में कुछ हिन्दुओ को छोड़ दिया जाय तो शायद ही कोई मिला जो भाई-चारे की बात करें...........कुछ आतंकवादी घटनाओ की वजह से पुरे मुस्लिम कौन के खिलाफ नफरत का बीज बोया जा रहा जबकि हकीकत यह है इन आतंकवादी घटनाओ में हिन्दू संगठनो का बहुत बड़ा हाथ है मुसलमानों को बदनाम करने की. चुकी हरेक डिपार्टमेंट में हिन्दुओ की संख्या ज्यादे है अतः वो खुद बा-इज्जत बच जाते और दुनिया के सामने रोना रोते रहते हैं......और जो आप यहाँ राम मंदिर में राम की पूजा को लेकर नफ़रत फैला रहे हैं........तो हकीकत तो यह है की मुसलमानों को वहां राम मंदिर होने से कोई शिकायत नहीं बल्कि आप जैसे कुछ विचार धारको को वह बाबरी-मस्जिद होने से शिकायत थी जो आज भी है. और जो हिस्सा विवादस्पद है वह मंदिर से काफी दूर है .............अरे आप हिन्दू नहीं बन सकते तो कम से कम आदमी तो बनकर रहिये . क्यों शैतान बनाना चाहते हैं.........

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

चन्दन भाई इस विषय पर बहुत ही गहन अध्ययन की आवश्यकता है....आपका लेख सराहनीय है.... सर्वप्रथम हिन्दू शब्द एक समय किसी धर्म का परिचायक न होकर सिर्फ एक क्षेत्र विशेष में रहने वाले लोगों की पहचान से जुड़ा हुआ था...हिंदुत्व शब्द उनके आचरण को संबोधित करता है...और हिन्दुओं का आचरण सदा से ही उदारवादी रहा है...उन्होंने प्रत्येक विदेशी का अपनी भूमि पर हमेशा स्वागत किया, किन्तु जब उन विदेशियों ने ही उनका शोषण करना शुरू किया तब हिदुओं ने उनका विरोध किया....इस प्रकार असली हिन्दू वह है जो किसी धर्म विशेष या जाति विशेष का विरोध न करके बुरे कार्य और उन्हें करने वाले निश्चित लोगों का विरोध करे न की पूरे के पूरे सम्प्रदाय का विरोध...प्रत्येक मनुष्य प्रकृति का एक अभिन्न अंग है और उसे इस संसार में कहीं भी तब तक रहने का अधिकार होना चाहिए जब तक वह प्राकृतिक विधि(नैतिकता) के विरुद्ध कोई आचरण न कर रहा हो.....इस विषय पर आपका लेख सराहनीय कदम है...

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

प्रिय चन्दन जी ये ज्वलंत मुद्दे हैं ..सच में देखिये तो मानव धर्म ही हम सब के लिए हितकर है ..हम हिन्दू हैं वो मुस्लिम हैं तो है सब धर्म कुछ न कुछ क्या बल्कि सभी अच्छी बातें सिखाता है ये बात अलग है की हम उसे किस तरह से लेते हैं ..हिंदुत्व..हिन्दू धर्म बुरा नहीं है बहुत सहन शील है मानवता को लेकर चलता रहा है सहिष्णु रहा है अब इसे लेकर राजनीति करें लोग एकजुटता कर नेतागिरी कर तो बुरा हो ही जाता है कभी कभी जब कोई एक धर्मं अन्याय करता दिखाई देता है तो दूजा उसे सामने ला एक वाद मुस्लिमवाद हिन्दू वाद बना लेता है ..कभी कभी ये अपनी रक्षा के लिए जरुरी भी देखा गया है कभी अति हो जाती है तो हानि ऐसे मुद्दे छेड़ने से अंत नहीं है ... आइये मानव धर्म अपनाएं सब को मित्र बनायें भाई चारा रख स्थिति को देखते हुए प्यार बरसाने का यत्न करें सुन्दर जानकारी दी है आप ने ... भ्रमर ५

के द्वारा:

कुछ व्यस्तता के कारन बहुत से ब्लॉगों तक नहीं पहुँच पा रहा था और पहुंचा भी तो सब जगह से घूमकर इस ब्लाग पर मेरे कदम रुक गए..............अब तो जो कुछ भी होगा अगले दो-चार दिनों तक इसी ब्लॉग पर होगा........ इससे पहिले कि मैं वाक्-युद्ध की रणभेरी बजाऊ, सभी सम्मानित, आदरणीय और माननीय ब्लागरों से विनती करता हूँ कि अपनी उपलब्धि को किसी तिजोरी में बंद कर दे. वरना फिर उनको मुझसे शिकायत रह जाएगी.......और जितना होमवर्क करना है कर ले ///////इतिहास से लेकर ग्रंथों तक ...गीता से लेकर कुरआन तक ..और भूत से लेकर भविष्य तक ...............मतलब अपनी पूरी तैयारी कर ले ...............वरना मुझसे ज्यादा उन्हें खुद से शिकायत रह जाएगी............! और हाँ मैं नहीं चाहता कि कोई कायरों और बुजदिलों की तरह यह मैदान छोड़कर जाएँ..........और अपने नापाक इरादों को लेकर समाज और देश में नफ़रत का बीज बोता रहे क्योंकि अब बहुत हो चूका गन्दी मानसिकता का खेल ............खुद को हिन्दू, मुस्लिम, सिख ईसाई कहकर मानवता को रौदने वालो बेशर्मो और बेर्लाज्जों सावधान......................अब और हिन्दू, मुस्लिम का रोना बंद करों......................अलीन............

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

अशोक जी , मैंने यही माना है और यही लिखने का उद्देश्य भी की हिन्दुस्तान का हिंदुत्व सबसे उदारवादी सोच है और कर्म है , यदि हम पर कोई आक्षेप करता है तो क्या हम उदारवादी सोच त्याग दे ,हम भी अशभय ,दुराचारी कार्य में सम्मिलित हो जाए ,आज जब विश्व हमारी जैविक विविधतता के पश्चात हमारी राष्ट्रिय एकता का उदाहरण देता तो क्या हम उसे खंडित कर दे , यदि कोई मुस्लिम विरोधी बात कहता है ,वो भी चंद आतंकवादिओं के कारन तो जरा वह इतिहास और अपना मन खंगाल ले की भारत को आजादी दिलाने वाले क्रान्तिकारिओन में मुस्लिम सामान रूप से सहभागी थे , और इसी सनुचित मानसिकता ने देश को बाट दिया ,और समय पर दंगों का घात ,आतंकवाद इसी अलगाववादी रुग्न सोच का नतीजा है , मे अपनी कविता के दो पंक्तिया कहना चाहूंगा , कौन कहता है लहू मत उबालो ,म्यान से तलवार न खींचो , में कहता हूँ मेरे भाई जन्हा देखो मुहब्बत ,अदब से सर झुका लो !

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

चन्दन जी नमस्कार, मैंने आलेख के साथ ही प्रतिक्रियाएं भी पढ़ीं कई पाठकों ने प्रतिक्रया में गुस्सा जाहिर किया है. साफ़ कारण है की हिन्दुस्तान में बार बार हिन्दू की ही क्यों परिक्षा ली जाती है क्या हमारे देश में मुसलमानों को हिन्दुओं के क़त्ल की खुली छुट मिली हुई है और हिन्दुओं को उसमे उफ़! तक कहने का हक़ नहीं है? मै किसी की धार्मिक भावना को नहीं भड़का रहा हूँ किन्तु हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता का सम्पूर्ण आभाव है और इसी कारण बार बार सहिष्णु धारावादी हिन्दुओं को ही नसीहत दी जाती है और इसके परिणाम भी सामने हैं. पिछले कई दिनों से मै देख रहा हूँ मोदी के नाम पर गुजरात दंगो को ही सिर्फ याद किया जाता है गोधरा में हुए हिन्दुओं के क़त्ल को भुला दिया जाता है. एक आँख खोलकर कोई भी शिकारी शिकार ही करता है दुनिया को सही नजरिये से देखना है तो फिर दोनी आँखे खुली रखनी होगी. राजनैतिक दल देश में अपने निजी स्वार्थों के वशीभूत होकर सिर्फ वैमनस्यता ही फैला रहे हैं. हम सामान्य नागरिक भी उनमे शामिल हो कर हिंदुत्व और मुस्लिमत्व की बातें करने लगे तो देश के नागरिकों का जीवन ही नरक हो जाएगा. इसलिए यदि बात करनी है तो सर्वधर्म समभाव की बात करें वाही उचित होगा.

के द्वारा: akraktale akraktale

दिनेश जी , मै हिंदुत्व के सैधांतिक मूल्यों की बात कह रह हूँ , जिसमे कायरता का होना या ना होना एल अलग पहलु है ,मै पहले ही लिख चुका हूँ की हमारे राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा करना हमारे मूल उद्देश्य है ,फिर इसमें कायरता की कोई बात ही नहीं रह जाती , मै अल्पसंख्यकों के आचरण पर बात कर लेख के उद्देश्य से भटकना नहीं चाहता ,मै तो हिंदुत्व के दायित्व की बात कह रहा हूँ !इसलिय तो हिदुत्व सबसे उदार और श्रेष्ठ सोच है ! पर हां अल्पसंख्यकों के आचरण ,उनके जेहादी मूल पर ,गहन चर्चा की आवश्यकता है की आम जन का भ्रम दूर हो सके , क्यूंकि चंद लोगो ने मुजाहिदों की फितरत को बरगला उन्हें देश तोड़ने पर आमादा कर दिया है

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

चंदन  जी, नमस्कार,  हिन्दुत्व के  विचार हमें महान  तो बनाते हैं, साथ  ही  गुलाम  भी बनाते हैं। हजारों वर्ष  तक  हम  इसी सोच  के कारण  गुलाम  बने रहे। मैं हिंसा का समर्थन नहीं कर रहा, लेकिन  यह भी स्वीकार नहीं कर सकता कि कोई हम  पर अत्याचार करता रहे और हम  अपने मूलभूत  विचारों तथा सिद्धांतों की दुहाई देकर चुप रहें। मैं यह भी नहीं कहता कि प्राचीन  काल  मैं हम  पर जो  अत्याचार  किये गये उनका बदला लिया जाय। मेरा तो यही कहना कि अब  हमें हिन्दुत्व की दुहाई देकर कायर न बनाया जाय। मुझे इतिहास  में  कहीं भी नजर नहीं आता कि धार्मिक  हिंसा की शुरूआत  हिन्दुओं ने की हो। हमारा इतिहास  बहुत  दर्दनाक  है।  मैं हिन्दुवाद  का कतई समर्थन  नहीं करता, किन्तु मुस्लिम  तुष्टिकरण  की नीति का खुलकर  विरोध  करता हूँ।  आपने जिस  तरह का आलेख  लिखा है, क्या किसी मुसलमान में इतना सामर्थ  है कि  इस्लाम  के संबंध  में इस  तरह का आलेख  लिख   सके। तुरन्त फतवा जारी हो जायगा। हो सकता है कि उसके कत्ल का भी फऱमान  जारी हो जाय  तथा फतवा और  फरवान  जारी करने वाले को दिग्गी, मुलायम , नितीश  तथा लालू आदि की पार्टी से टिकट भी मिल जाय। क्या यह शर्मनाक  नहीं है? बहुसंख्यक  हिन्दु दूसरे धर्म  का अपने धर्म  जितना सम्मान करते हैं। किन्तु क्या आप अन्य धर्मालम्बियों के बारे में ऐसा दावे से कह सकते हैं? शायद नहीं।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

चन्दन जी हिंदुत्व एक जीवन पद्दति है ना की कोई धर्म और ऐसा आप अपने लेख में स्वीकार भी करते है की हिंदुत्व कभी तोड़ने की बात नहीं करता तो आज के तथाकथित धर्म निरपेक्षो को इससे डर क्यों लगता है .सिर्फ मुसलमानों का १५ फीसदी वोट प्राप्त करने के लिए पूरी की पूरी हिन्दू संस्कृति को ही कटघरे में खड़ा करना क्या जायज है चाहे राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ हो या फिर उसके अनुसांगिक संगठन कभी ये नहीं कहते की मुश्ल्मानो ,यहुदियो ,इसइयो को हिन्दुस्थान में रहने का कोई हक़ नहीं है या इन्हें यहाँ से भगा देना चाहिए जबकि मुश्लिम चरमपंथी गुट भारत को खंडित कर मुश्लिम राज्य सत्ता स्थापित करने की घोषणा खुले आम करते है ,(आसाम ,नागालैंड ,मणिपूर ,मिजोरम ,बंगाल के कुछ क्षेत्र ,बिहार ,उत्तर प्रदेश ,झारखण्ड के कुछ क्षेत्र , ,केरल ,गोवा )में हिन्दुओ की स्तिथि देखे ,लेकिन तब आप जैसे लोग कोई टिका टिपण्णी नहीं करते .आज आप मुश्लिम मुल्को में चले जाये क्या आप खुद के उपासना पद्दति से उपासना कर सकते है लेकिन ये हिंदुत्व ही है जो हिंदुस्तान में सब अपनी अपनी उपश्ना पद्दति निर्भीक हो कर मानते है और उपासना करते है . १०० करोड़ की हिन्दू आबादी वाले इस देश में भगवन राम के मंदिर में पूजा करने के लिए कोर्ट के आदेश का इंतजार शांति पूर्वक करना हिंदुत्व का दर्शन है अन्यथा इतनी तो ताकत है की आज चाह ले तो मंदिर भी बन सकता है और पूजा भी हो सकती है लेकिन हिंदुत्व ऐसा नहीं सिखाता इस लिए चुप्पी साधे कोर्ट के आदेश का इंतजार किया जाता है संघ हमेशा जोड़ना सिखाता है तोडना नहीं .संघ और उसके अनुसांगिक संगठनों को नजदीक से जाने अनेको साहित्य है संघ की कर्यपद्दाती से सम्बंधित उसे पढ़े .फिर देखे संघ क्या है .?

के द्वारा: jagojagobharat jagojagobharat

विक्रम जी , मैंने हिंदुत्व और हिन्दुवाद के मर्मांतर को रखने का प्रयास किया है , कोई भी भारतवासी हिन्दू मुस्लिम ,सिख ,इसाई, हिंदुत्व का विरोधी नहीं है ,मै भी उसी हिंदुत्व का समर्थक हूँ , क्यूंकि हिंदुत्व सर्वधर्म हिताय की बात रखता है ,वह इक विशेष वर्ग वर्ण के उत्थान की बात नहीं कहता ! पर हिंदूवादी सोच केवल हिन्दू धर्म समुदाय के हित और अन्य धर्म की उपेक्षा करता है ,जिसका में समर्थक नहीं हूँ , ऐसे ही चंद संकुचित मानसिकता के लोगो ने जेहाद की परिभाषा बदल दी थी ! और चंद लोगो की सोच हिंदुत्व पथ पर चलते हुए हिन्दुवाद के दायरे में फस कर रह गई है ! मैंने कंही भी हिन्दू या मुसलमान को आतंकवाद का जिम्मेदार नहीं कहा , बल्कि में तो उस दकियानूसी सोच की बात कह रहा हूँ जो इक आस्था से अंधविश्वास की और बढ़ चली है अब आप को तय करना है आप हिंदुत्व के पक्षधर है या हिंदूवादी सोच के !

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

चन्दन जी....नमस्कार... हो क्या गया है आपको....??? आज कहीं भंग या कुछ ऐसा ही कोई नशा तो नहीं कर के आये..... अरे साहब....आपको....ये तो दिख गया...और आपने बोल भी दिया....या ये कहिये....आप 'हिन्दू' को 'आतंकवादी' घोषित करने पर आमादा हैं..... ''अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद ध्वस्तीकरण ,गुजरात में गोधरा काण्ड ,मालेगांव ब्लास्ट , मडगांव ब्लास्ट, हमारे हिंदुत्व के कपाल पर कभी ना मिटने वाली कालिख और शर्मनाक राष्ट्रिय दुर्घटना है! लेकिन....मुंबई ब्लास्ट कांड........पार्लियामेंट पर हमला......मुंबई में आतंकवादी अटैक.......दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर....जम्मू का रघुनाथ मंदिर.....जम्मू की हाजी दरगाह....और भी बहुत सारे हैं.....इन सबको तो आप (शायद नहीं यक़ीनन) 'उच्चतम राष्ट्रीय गौरव' का नाम देंगे.......??? और अफज़ल गुरु...कसाब...जैसों को 'भारत-रत्न' देने की मांग भी करेंगे...... आपको तो 'दिग्विजय दिग्गी' के साथ वाली कुर्सी पर बैठना चाहिए......

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh

चन्दन जी....नमस्कार... हो क्या गया है आपको....??? आज कहीं भंग या कुछ ऐसा ही कोई नशा तो नहीं कर के आये..... अरे साहब....आपको....ये तो दिख गया...और आपने बोल भी दिया....या ये कहिये....आप 'हिन्दू' को 'आतंकवादी' घोषित करने पर आमादा हैं..... ''अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद ध्वस्तीकरण ,गुजरात में गोधरा काण्ड ,मालेगांव ब्लास्ट , मडगांव ब्लास्ट, हमारे हिंदुत्व के कपाल पर कभी ना मिटने वाली कालिख और शर्मनाक राष्ट्रिय दुर्घटना है! लेकिन....मुंबई ब्लास्ट कांड........पार्लियामेंट पर हमला......मुंबई में आतंकवादी अटैक.......दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर....जम्मू का रघुनाथ मंदिर.....जम्मू की हाजी दरगाह....और भी बहुत सारे हैं.....इन सबको तो आप (शायद नहीं यक़ीनन) 'उच्चतम राष्ट्रीय गौरव' का नाम देंगे.......??? और अफज़ल गुरु...कसाब...जैसों को 'भारत-रत्न' देने की मांग भी करेंगे...... आपको तो लोकसभा में 'दिग्विजय दिग्गी' के साथ वाली कुर्सी पर बैठना चाहिए......

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh